Transliteration: (Wa maa lahum allaa yu'az zibahumul laahu wa hum yasuddoona 'anil Masjidil-Haraami wa maa kaanooo awliyaaa'ah; in awliyaaa' uhooo illal muttaqoona wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon)
यह आयत साफ़ कर देती है कि काफ़िरों पर अज़ाब आना लाज़िम है,
क्योंकि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ और ईमान वालों को
मस्जिद-ए-हराम से रोकने का जुर्म किया।
यह गुनाह इतना संगीन है कि
दुनिया में भी अल्लाह ने उन्हें शिकस्त दी,
और आख़िरत में अज़ाब उनका इंतज़ार कर रहा है।
यह चेतावनी भी है कि किसी ईमान वाले को
बिना हक़ के मस्जिद से रोकना
बहुत बड़ा गुनाह है।
काफ़िर अपने आपको मस्जिद-ए-हराम का
ख़ादिम और संरक्षक समझते थे,
लेकिन कुरआन ने यह दावा झुठला दिया।
असल हिफ़ाज़त और सरपरस्ती का हक़
सिर्फ़ उन लोगों को है जिनके दिलों में तक़वा है।
तक़वा का मतलब है —
कुफ़्र, गुनाह, शुब्हात और हर उस चीज़ से बचना
जो अल्लाह से ग़ाफ़िल कर दे।
सिर्फ़ बाहरी रस्में या
गुनाह में डूबकर “विलायत” का दावा करना
ख़ुली गुमराही है।
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