कुरान - 8:34 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
وَمَا لَهُمۡ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ ٱللَّهُ وَهُمۡ يَصُدُّونَ عَنِ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ وَمَا كَانُوٓاْ أَوۡلِيَآءَهُۥٓۚ إِنۡ أَوۡلِيَآؤُهُۥٓ إِلَّا ٱلۡمُتَّقُونَ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa maa lahum allaa yu'az zibahumul laahu wa hum yasuddoona 'anil Masjidil-Haraami wa maa kaanooo awliyaaa'ah; in awliyaaa' uhooo illal muttaqoona wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon)

तो उनके पास कौन-सा बहाना है
कि अल्लाह उन्हें अज़ाब न दे,
जबकि वे तुम्हें मस्जिद-ए-हराम [68] से रोकते हैं,
और वे उसके संरक्षक नहीं हैं।
उसके संरक्षक तो सिर्फ़ परहेज़गार [69] हैं,
लेकिन उनमें से ज़्यादातर जानते नहीं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 34 की तफ़्सीर

✅ [68] मस्जिद-ए-हराम से रोकना अज़ाब का सबब

यह आयत साफ़ कर देती है कि काफ़िरों पर अज़ाब आना लाज़िम है,
क्योंकि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ और ईमान वालों को
मस्जिद-ए-हराम से रोकने का जुर्म किया।
यह गुनाह इतना संगीन है कि
दुनिया में भी अल्लाह ने उन्हें शिकस्त दी,
और आख़िरत में अज़ाब उनका इंतज़ार कर रहा है।
यह चेतावनी भी है कि किसी ईमान वाले को
बिना हक़ के मस्जिद से रोकना
बहुत बड़ा गुनाह है।

✅ [69] हक़ीक़ी सरपरस्ती सिर्फ़ परहेज़गारों के लिए

काफ़िर अपने आपको मस्जिद-ए-हराम का
ख़ादिम और संरक्षक समझते थे,
लेकिन कुरआन ने यह दावा झुठला दिया।
असल हिफ़ाज़त और सरपरस्ती का हक़
सिर्फ़ उन लोगों को है जिनके दिलों में तक़वा है।
तक़वा का मतलब है —
कुफ़्र, गुनाह, शुब्हात और हर उस चीज़ से बचना
जो अल्लाह से ग़ाफ़िल कर दे।
सिर्फ़ बाहरी रस्में या
गुनाह में डूबकर “विलायत” का दावा करना
ख़ुली गुमराही है।

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