Transliteration: (Kaamaaa akhrajaka Rabbuka mim baitika bilhaqq; wa inna fareeqam minal mu'mineena lakaarihoon)
यह आयत उस वक़्त की है जब रसूल ﷺ अपने सहाबा के साथ मदीना से अबू सुफ़यान के काफ़िले को रोकने के इरादे से निकले। यह मामूली टक्कर समझी जा रही थी लेकिन मामला पहली बड़ी जंग बद्र तक पहुँचा। क़ुरैश ने अबू जहल की क़ियादत में एक हज़ार का लश्कर भेजा जबकि मुसलमान केवल 313 और बेहद कमज़ोर हथियारों वाले थे। कुछ सहाबा इस अचानक जंग को लेकर हिचकिचाए लेकिन हज़रत अबू बकर और उमर (रज़ि०) ने पूरा भरोसा जताया कि रसूल ﷺ जहाँ ले जाएँगे वहीं जाएंगे। रसूल ﷺ ने अल्लाह पर भरोसा रखते हुए फतह की पेशीनगोई की और दुश्मनों के सरदारों की मौत की जगहें पहले ही बता दीं, जो ठीक वैसी ही साबित हुईं।
आयत में नापसंद करने का मतलब यह नहीं कि उन्होंने ईमान छोड़ा बल्कि यह एक कुदरती हिचकिचाहट थी। अल्लाह ने उन्हें फिर भी मोमिन कहा। इससे मालूम हुआ कि अगर मुसलमान हालात की वजह से किसी रणनीति पर घबराए या मतभेद जताए तो यह कुफ़्र नहीं बल्कि इंसानी कमजोरी है, बशर्ते कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत पर कायम रहे।
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