कुरान - 8:62 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

62
وَإِن يُرِيدُوٓاْ أَن يَخۡدَعُوكَ فَإِنَّ حَسۡبَكَ ٱللَّهُۚ هُوَ ٱلَّذِيٓ أَيَّدَكَ بِنَصۡرِهِۦ وَبِٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Wa iny yureedooo any-yakhda'ooka fainna hasbakal laah; Huwal lazeee aiyadaka binasrihee wa bilmu'mineen)

और अगर वे सुलह (शांति) की तरफ़ झुकें, तो तुम भी उसकी तरफ़ झुको और अल्लाह पर भरोसा करो। बेशक, वही है जो सुनने वाला, जानने वाला है [138]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 62 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 61 की तफ़्सीर

✅ [138] सुलह की पेशकश स्वीकार करने का हुक्म

इस आयत में हुक्म है कि अगर दुश्मन सुलह की तरफ़ झुकें, तो मुसलमान भी उसे क़ुबूल करें। मगर यह शर्त के साथ है कि सुलह मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद और मुनासिब हो।

  • इस्लाम में मशरिक़ों और कुफ़्फ़ार के साथ सुलह और मुआहदा (समझौता) जायज़ है।
  • उनसे जिज़्या (कर) भी लिया जा सकता है।
  • लेकिन मुरतद (जो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो जाए) से न तो जिज़्या लिया जा सकता है और न ही सिर्फ़ सुलह, बल्कि उनके लिए सिर्फ़ दो रास्ते हैं—दोबारा ईमान लाना या जंग।

आख़िर में यह ताकीद की गई कि अल्लाह पर भरोसा रखो, क्योंकि वही सबकी नीयतों और अंजाम को जानता है।

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