Transliteration: (Yaaa aiyuhan Nabiyyu hasbukal laahu wa manittaba 'aka minal mu'mineen)
यह आयत इस हक़ीक़त को बयान करती है कि अल्लाह पर भरोसा रखना और साथ ही नेक ईमानवालों के सहारे को क़बूल करना कोई तज़ाद नहीं है। अल्लाह ने फ़रमाया कि उसके नबी ﷺ के लिए वह ख़ुद काफ़ी है, और उनके साथ चलने वाले मोमिन भी उनके लिए ताक़त और सहारा हैं।
इससे साबित हुआ कि अल्लाह के सच्चे बंदों पर एतिमाद करना भी जाइज़ है। इसी तर्ज़ पर यह दुआ कहना सही है: "अल्लाह और उसके रसूल ﷺ हमें भलाई अता फ़रमाएं।"
तफ़्सीर रूहुल बय़ान के मुताबिक़, यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) इस्लाम लाए। उस वक़्त मुसलमानों की तादाद चालीस तक पहुँच चुकी थी। हज़रत उमर की दुआएँ नबी ﷺ ने कीं, और अल्लाह ने फ़ौरन क़बूल कीं।
इस तरह अल्लाह ने अपने नबी ﷺ को तसल्ली दी कि आप अकेले नहीं हैं — अल्लाह और मोमिन आपके साथ हैं।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat