Transliteration: (Al'aana khaffafal laahu 'ankum wa 'alima anna feekum da'faa; fa-iny yakum minkum mi'atun saabiratuny yaghliboo mi'atayn; wa iny-yakum minkum alfuny yaghlibooo alfaini bi iznil laah; wallaahu ma'as saabireen)
इस आयत में पहले के हुक्म की ताख़्फ़ीफ़ की गई। पहले मुसलमानों को हुक्म था कि एक मोमिन दस कुफ़्फ़ार का मुक़ाबला करे, लेकिन अब अल्लाह ने उनकी हालत को देखते हुए यह बोझ हल्का कर दिया और एक बनाम दो कर दिया। यहाँ कमजोरी से मुराद ईमान की नहीं, बल्कि जिस्मानी और इंसानी ताक़त की कमी है। यह अल्लाह की रहमत और अपने बन्दों पर उसकी रहनुमाई का सबूत है।
फतह-ओ-नुसरत संख्या या ज़ाहिरी ताक़त पर नहीं, बल्कि अल्लाह के इज़्न और मदद पर मुनहसर है। अल्लाह चाहे तो कमज़ोर को मज़बूत पर ग़ालिब कर दे। इसी लिए अल्लाह ने फ़रमाया कि वह सब्र करने वालों के साथ है। सब्र ही असली हिम्मत और अल्लाह की मदद पाने की कुंजी है।
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