कुरान - 8:68 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

68
لَّوۡلَا كِتَٰبٞ مِّنَ ٱللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمۡ فِيمَآ أَخَذۡتُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ

Transliteration: (Law laa Kitaabum minal laahi sabaqa lamassakum fee maaa akhaztum 'azaabun 'azeem)

अगर अल्लाह का पहले से लिखा हुआ हुक्म [153] न होता, तो जो फ़िदया तुमने कुफ़्फ़ार से लिया है उस पर तुमको बड़ा अज़ाब छू जाता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 68 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 68 की तफ़्सीर

✅ [153] अल्लाह का पहले से लिखा हुआ हुक्म और इज्तिहाद की मग़फ़िरत

यह आयत ग़ज़वा-ए-बद्र के कैदियों से लिए गए फ़िदये के बारे में नाज़िल हुई। अल्लाह ने साफ़ फ़रमा दिया कि अगर पहले से मग़फ़िरत और आसानी का हुक्म न लिखा होता तो यह अमल सख़्त अज़ाब का सबब बनता।

  • बद्र के सहाबा पर अल्लाह की हिफ़ाज़त और रहमत है, इसलिए उन्हें न इस दुनिया में और न आख़िरत में सज़ा दी जाएगी।
  • इज्तिहाद (दीन में राय क़ायम करना) अगर नतीजे में बिल्कुल दुरुस्त न भी हो, मगर नियत नेक हो, तो अल्लाह उसके गुनाह को माफ़ कर देता है।
  • नबी ﷺ ने सहाबा से मशवरा लिया और हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) की राय पर अमल किया। इससे मालूम हुआ कि मशवरा लेना और दीन के मसाइल में राय क़ायम करना शरीअत में जाइज़ और साबित है।
  • अगर यह अमल नाजायज़ होता तो नबी ﷺ हरगिज़ उस पर अमल न करते।

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