कुरान - 29:14 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوۡمِهِۦ فَلَبِثَ فِيهِمۡ أَلۡفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمۡسِينَ عَامٗا فَأَخَذَهُمُ ٱلطُّوفَانُ وَهُمۡ ظَٰلِمُونَ

Transliteration: (Wa laqad arsalnaa Noohan ilaa qawmihee falabisa feehim alfa sanatin illaa khamseena 'aaman fa akhazahumut toofaanu wa hum zaalimoon)

और बेशक हमने नूह को उनकी क़ौम की तरफ़ भेजा [28], तो वे उनमें पचास साल कम एक हज़ार बरस (साढ़े नौ सौ साल) रहे [29]; फिर उन्हें तूफ़ान ने आ पकड़ा इस हाल में कि वे ज़ालिम थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 14

"और बेशक हमने नूह को उनकी क़ौम की तरफ़ भेजा [28], तो वे उनमें पचास साल कम एक हज़ार बरस (साढ़े नौ सौ साल) रहे [29]; फिर उन्हें तूफ़ान ने आ पकड़ा इस हाल में कि वे ज़ालिम थे।"

[28] हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बअ़सत

हज़रत नूह सबसे पहले रसूल थे जिन्हें काफ़िरों की तरफ़ भेजा गया। उन्होंने अपनी क़ौम को दिन-रात अल्लाह की तौहीद की दावत दी।

[29] साढ़े नौ सौ साल की तवील दावत और सब्र

हज़रत नूह ने नौ सौ पचास (950) साल तक अपनी क़ौम की सख़्त तकालीफ़ और मज़ाक़ पर सब्र फ़रमाया। जब क़ौम अपनी सरकशी पर अड़ी रही और कोई उम्मीद बाक़ी न रही, तो तूफ़ान-ए-नूह ने उन ज़ालिमों को ग़र्क़ कर दिया।

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