Transliteration: (Wa ilaa Madyana akhaahum Shu'ayban faqaala yaa qawmi'-budul laaha warjul yawmal aakhira wa laa ta'saw fil ardi mufsideen)
"और मदयन की तरफ़ हमने उनके भाई शुऐब को भेजा [86]; उन्होंने फ़रमाया, 'ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो और आख़िरत के दिन की उम्मीद रखो [87], और ज़मीन में फ़साद मचाते न फिरो [88]।'"
हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम कोई अजनबी न थे, बल्कि मदयन वालों के ही ख़ानदान और क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे। अल्लाह तआला की हिकमत है कि वह इंसानों की हिदायत के लिए उन्हीं में से रसूल भेजता है जो उनकी भाषा और हालात को बख़ूबी समझते हैं। यहाँ "भाई" फ़रमाने से मुराद क़ौमी व नसब का ताल्लुक़ है, मर्तबे की बराबरी नहीं।
हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को अल्लाह की वहदानियत और इबादत की दावत दी और क़यामत के दिन पर यक़ीन रखने की ताकीद फ़रमाई। मोमिन के लिए आख़िरत का दिन रहमत और अज्र-ओ-सवाब की उम्मीद का दिन है, जबकि काफ़िर के लिए यह ख़ौफ़ और हसरत का दिन है। असली तैयारी ईमान और नेक आमाल से होती है।
आपने उन्हें ज़मीन में सरकशी और फ़साद फैलाने से रोका, ख़ास तौर पर कुफ़्र, नाफ़रमानी और नाप-तौल में कमी (डंडी मारना) जैसी बद-अख़लाक़ी से। ऐसी बुराइयां समाज को तबाह कर देती हैं और अल्लाह के अज़ाब को दावत देती हैं।
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