कुरान - 29:39 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
وَقَٰرُونَ وَفِرۡعَوۡنَ وَهَٰمَٰنَۖ وَلَقَدۡ جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَٱسۡتَكۡبَرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَمَا كَانُواْ سَٰبِقِينَ

Transliteration: (Wa Qaaroona wa Fir'awna wa haamaana wa laqad jaaa'ahum Moosa bilbaiyinaati fastakbaroo fil ardi wa maa kaanoo saabiqeen)

और क़ारून [94], फ़िरऔन [95] और हामान को भी (हलाक किया); और बेशक मूसा उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे, तो उन्होंने ज़मीन में तकब्बुर किया [96], और वे (हमारी पकड़ से) आगे निकल जाने वाले न थे [97]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 39

"और क़ारून [94], फ़िरऔन [95] और हामान को भी (हलाक किया); और बेशक मूसा उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे, तो उन्होंने ज़मीन में तकब्बुर किया [96], और वे (हमारी पकड़ से) आगे निकल जाने वाले न थे [97]।"

[94] क़ारून और ज़कात का इंकार

क़ारून अगरचे फ़िरऔन की तरह ख़ुदाई का मुद्दई न था, मगर उसने अल्लाह के मुक़र्रर कर्दा फ़रीज़े ज़कात का साफ़ इंकार कर दिया था। शरीअत के किसी एक क़तई हुक्म का इंकार भी इंसान को कुफ़्र तक पहुँचा देता है। हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने भी ज़कात के मुनकिरों के ख़िलाफ़ जिहाद फ़रमाया था क्योंकि दीन के किसी एक हुक्म को झुठलाना पूरे दीन को झुठलाने के बराबर है।

[95] ख़ानदानी बड़ाई नजात का ज़रिया नहीं

क़ारून हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ही ख़ानदान (चचाज़ाद भाई) से था, मगर यह जलीलुल-क़द्र नसब और पैग़म्बरी घराना भी उसे कुफ़्र और नाफ़रमानी के अज़ाब से न बचा सका। इससे क़ुरैश को समझाया गया कि रसूलुल्लाह ﷺ से ख़ानदानी क़राबतदारी उसी वक़्त नफ़ा देगी जब दिल में ईमान और ताअत होगी।

[96] तकब्बुर और सरकशी

इन तीनों ने ज़मीन में ग़ुरूर और सरकशी की: फ़िरऔन और हामान ने हुकूमत और ताक़त के नशे में वहदानियत और रिसालत का इंकार किया, और क़ारून ने अपनी दौलत के घमंड में शरीअत के अहकाम को ठुकराया। तकब्बुर इंसान को हक़ की पैरवी से अंधा कर देता है।

[97] अल्लाह की पकड़ से कोई बच नहीं सकता

"वे हमसे आगे निकल जाने वाले न थे" का मतलब है कि वे अल्लाह की क़ुदरत और उसकी गिरफ़्त से भागकर कहीं बच नहीं सकते थे। जब अल्लाह का क़हर नाज़िल होता है तो दुनिया की कोई फ़ौज, ख़ज़ाना या तदबीर इंसान को बचा नहीं सकती।

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