कुरान - 29:40 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
فَكُلًّا أَخَذۡنَا بِذَنۢبِهِۦۖ فَمِنۡهُم مَّنۡ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِ حَاصِبٗا وَمِنۡهُم مَّنۡ أَخَذَتۡهُ ٱلصَّيۡحَةُ وَمِنۡهُم مَّنۡ خَسَفۡنَا بِهِ ٱلۡأَرۡضَ وَمِنۡهُم مَّنۡ أَغۡرَقۡنَاۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ

Transliteration: (Fakullan akhaznaa bi zanbihee faminhum man arsalnaa 'alaihi haasibaa; wa minhum man akhazat hus saihatu wa minhum man khasafnaa bihil arda wa minhum man aghraqnaa; wa maa kaanal laahu li yazlimahum wa laakin kaanoo anfusahum yazlimoon)

तो हमने हर एक को उसके गुनाह के बाइस पकड़ लिया [98]; पस उनमें से बाज़ पर हमने पत्थरों की आंधी भेजी, और बाज़ को एक भयानक चीख़ ने आ पकड़ा, और बाज़ को हमने ज़मीन में धंसा दिया, और बाज़ को हमने (दरिया में) ग़र्क़ कर दिया [99]; और अल्लाह की यह शान न थी कि उन पर ज़ुल्म करता, बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे थे [100]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 40

"तो हमने हर एक को उसके गुनाह के बाइस पकड़ लिया [98]; पस उनमें से बाज़ पर हमने पत्थरों की आंधी भेजी, और बाज़ को एक भयानक चीख़ ने आ पकड़ा, और बाज़ को हमने ज़मीन में धंसा दिया, और बाज़ को हमने (दरिया में) ग़र्क़ कर दिया [99]; और अल्लाह की यह शान न थी कि उन पर ज़ुल्म करता, बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे थे [100]।"

[98] हर एक को अपने ही गुनाह की सज़ा

अल्लाह तआला का अज़ाब बेगुनाहों पर जुर्म के तौर पर नहीं आता, बल्कि हर क़ौम को उसकी अपनी सरकशी और जुर्म की पादाश में हलाक किया गया। अज़ाब भेजने से पहले ईमान वालों को महफ़ूज़ मक़ाम पर निकाल लिया जाता था।

[99] मुख़्तलिफ़ क़ौमों पर अज़ाब की क़िस्में

अल्लाह तआला ने उनके जुर्म के मुताबिक़ अलग-अलग तरह के अज़ाब भेजे:

  • क़ौमे लूत: उन पर आसमान से पत्थरों की बारिश बरसाई गई।
  • क़ौमे समूद: उन्हें एक भयानक आसमानी चीख़ ने हलाक कर दिया।
  • क़ारून: उसे उसके महलों और ख़ज़ानों समेत ज़मीन में धंसा दिया गया।
  • क़ौमे नूह और फ़िरऔन: उन्हें पानी के तूफ़ान और दरिया में ग़र्क़ कर दिया गया।

[100] अल्लाह की ज़ात ज़ुल्म से पाक है

अल्लाह तआला किसी पर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता, बल्कि इन लोगों ने रसूलों की नाफ़रमानी करके, शिर्क और गुनाहों का रास्ता चुनकर ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म ढाया था। जिस तरह ज़हर खाने वाला अपनी मौत का ख़ुद ज़िम्मेदार होता है, उसी तरह कुफ़्र इख़्तियार करने वाले अपनी बर्बादी के ख़ुद मुजरिम हैं।

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