Transliteration: (Wa laa tujaadilooo Ahlal Kitaabi illaa billatee hiya ahsanu illal lazeena zalamoo minhum wa qoolooo aamannaa billazeee unzila ilainaa wa unzila ilaikum wa illaahunna wa ilahukum waahidunw-wa nahnu lahoo muslimoon)
"और अहले किताब से बहस व मुबाहासा न करो मगर ऐसे तरीक़े से जो सबसे बेहतर हो [115], सिवाय उन लोगों के जिन्होंने उनमें से ज़ुल्म किया [116]; और कहो, 'हम उस (किताब) पर ईमान लाए जो हमारी तरफ़ उतारी गई और जो तुम्हारी तरफ़ उतारी गई [117]; और हमारा माबूद और तुम्हारा माबूद एक ही है, और हम उसी के फ़रमांबरदार (मुस्लिम) हैं [118]।'"
दीन की दावत और गुफ़्तगू में नरमी, दलील और अख़लाक़ का दामन थामना चाहिए। अहले किताब (यहूद व नसारा) से मुनाज़रा करते वक़्त सख़्त-कलामी, गाली-गलौज और मज़ाक़ उड़ाने से परहेज़ किया जाए ताकि हक़ बात उनके दिलों में उतर सके।
जो लोग सरकशी, ज़ुल्म, अहद-शिकनी और मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशों पर उतर आएं, या नबी करीम ﷺ की शान में गुस्ताख़ी करें, उनसे नरमी का हुक्म नहीं, बल्कि उनका सख़्ती और ताक़त से मुक़ाबला किया जाएगा।
मुसलमानों का अक़ीदा है कि तौरात, इंजील और ज़बूर सब अल्लाह की सच्ची किताबें थीं जो अपने-अपने वक़्त में नाज़िल हुईं। हम उन सब पर ईमान रखते हैं, मगर अमल सिर्फ़ आख़िरी किताब क़ुरआन करीम पर करते हैं क्योंकि क़ुरआन ने पिछली तमाम किताबों के अहकाम को मंसूख़ कर दिया है।
हमारा और तुम्हारा माबूद एक ही सच्चा ख़ुदा है और हम उसी के सामने सर-ब-सुजूद हैं। जो शख़्स तौरात या इंजील का मानने वाला हो, अगर वह क़ुरआन का इंकार करता है तो गोया वह ख़ुद अपनी किताबों की पेशीनगोइयों को झुठलाता है।
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