Transliteration: (Utlu maaa oohiya ilaika minal Kitaabi wa aqimis Salaata innas Salaata tanhaa 'anil fahshaaa'i wal munkar; wa lazikrul laahi akbar; wal laahu ya'lamu maa tasna'oon (End Juz 20))
"(ऐ नबी!) आप उस किताब की तिलावत कीजिए [110] जो आपकी तरफ़ वह्य की गई है, और नमाज़ क़ायम कीजिए [111]; बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है [112]; और यक़ीनन अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है [113]; और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो [114]।"
रसूलुल्लाह ﷺ को हुक्म दिया गया कि आप क़ुरआन पाक की तिलावत फ़रमाएं और उम्मत को इसकी तालीम दें। क़ुरआन की तिलावत सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पढ़ने का नाम नहीं, बल्कि इसके मानी व मफ़हूम को समझना, रूहानी दर्जात पाना और इसकी हिदायत को दुनिया भर में आम करना भी इसमें शामिल है।
नमाज़ को उसकी तमाम शर्तों, अरकान, ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू और पाबंदी के साथ अदा करना "नमाज़ क़ायम करना" कहलाता है। हुज़ूर अकरम ﷺ की नमाज़ पूरी उम्मत के लिए मुकम्मल नमूना है।
सच्ची नमाज़ जो दिल की हुज़ूरी और खुलूस से पढ़ी जाए, इंसान को गुनाहों, बेहयाई और नाफ़रमानी से रोक देती है। हदीस में आता है कि जो नमाज़ इंसान को बुराई से न रोके, वह हक़ीक़त में नमाज़ की रूह से ख़ाली है। नमाज़ इंसान के दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा करती है जो उसे हर बद-अमली से बचाता है।
अल्लाह के ज़िक्र की अज़मत सबसे आला है। इसके दो मफ़हूम हैं: एक यह कि नमाज़ ख़ुद अल्लाह का सबसे बड़ा ज़िक्र है; दूसरा यह कि बंदा जब अल्लाह को याद करता है तो अल्लाह तआला अपने बंदे को अपनी रहमत के साथ याद फ़रमाता है (फ़ज़कुरुनी अज़कुरकुम), और अल्लाह का अपने बंदे को याद फ़रमाना सबसे अज़ीम नेमत है।
अल्लाह तआला तुम्हारे तमाम आमाल—ज़ाहिर हों या बातिन—ख़ूब जानता है। इंसान को हमेशा यह एहसास रहना चाहिए कि उसका हर अमल अल्लाह की नज़रों के सामने है।
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