Transliteration: (Wa kazaalika anzalnaaa ilaikal Kitaab; fallazeena aatainaahumul kitaaba yu'minoona bihee wa min haaa'ulaaa'i many yu'minu bih; wa maa yajhadu bi'Aayaatinaa illal kaafiroon)
"और इसी तरह हमने आपकी तरफ़ किताब (क़ुरआन) नाज़िल फ़रमाई है [119]; पस जिन्हें हमने (पहले) किताब दी थी वे इस पर ईमान लाते हैं [120], और इनमें (क़ुरैश) से भी बाज़ इस पर ईमान लाते हैं [121]; और हमारी आयात का इंकार सिर्फ़ काफ़िर ही करते हैं [122]।"
जिस तरह पहले अम्बिया पर किताबें उतारी गईं, उसी मुबारक़ सिलसिले की तकमील के लिए हुज़ूर सय्यदे आलम ﷺ पर यह अज़ीम किताब क़ुरआन मजीद नाज़िल फ़रमाई गई। लिहाज़ा क़ुरआन के नुज़ूल पर ताज्जुब करना बे-बुनियाद है।
अहले किताब के मुंसिफ़-मिज़ाज उलमा (जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अन्हु) जिन्होंने अपनी किताबों में हुज़ूर ﷺ की निशानियाँ पढ़ी थीं, क़ुरआन सुनते ही फ़ौरन ईमान ले आए।
इसी तरह मुशरिकीने मक्का में से भी बहुत से नेक-बख़्त लोगों ने शिर्क छोड़कर इस्लाम क़बूल किया और सहाबियत का आला मक़ाम हासिल किया।
अल्लाह की रौशन आयात का इंकार वही लोग करते हैं जो हक़ को जान-बूझकर झुठलाने वाले और कुफ़्र पर अड़े रहने वाले हैं। उनका इंकार दलील की कमी की वजह से नहीं, बल्कि हसद और तकब्बुर की वजह से है।
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