Transliteration: (Wa maa kunta tatloo min qablihee min kitaabinw wa laa takhuttubhoo bi yameenika izal lartaabal mubtiloon)
"और आप इससे पहले न तो कोई किताब पढ़ते थे [123] और न ही अपने हाथ से उसे लिखते थे; वरना बातिल-परस्त ज़रूर शक में पड़ जाते [124]।"
ऐलान-ए-नुबूवत से पहले हुज़ूर अकरम ﷺ ने ज़ाहिरी तौर पर किसी इंसान से पढ़ना-लिखना नहीं सीखा था। अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को दुनियावी उस्तादों की शागिर्दी से पाक रखा और बराहे-रास्त ख़ुद तमाम उलूम-ओ-मआरिफ़ की तालीम अता फ़रमाई (अर-रहमान, अल्लामल क़ुरआन)।
अगर हुज़ूर ﷺ ज़ाहिरी तौर पर दुनियावी किताबों के पढ़े-लिखे होते, तो मुशरिकीन और बातिल-परस्त यह इल्ज़ाम लगाते कि इन्होंने पुरानी किताबों से नक़ल करके यह कलाम बना लिया है। अल्लाह तआला ने आपको उम्मी रखकर इस एतिराज़ की जड़ काट दी ताकि हर अक़्लमंद समझ ले कि यह बे-मिसाल क़ुरआन महज़ अल्लाह की वह्य और मौजिज़ा है।
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