Transliteration: (Awa lam yakfihim annaaa anzalnaa 'alaikal kitaaba yutlaa 'alaihim; inna fee zaalika larahmatanw wa zikraa liqawminy yu'minoon (section 5))
"क्या उनके लिए यह काफ़ी नहीं हुआ कि हमने आप पर किताब नाज़िल फ़रमाई [129] जो उन पर पढ़ी जाती है [130]? बेशक इसमें ईमान लाने वाले लोगों के लिए बड़ी रहमत और नसीहत है [131]।"
हुज़ूर अकरम ﷺ का सबसे बड़ा और दायमी मौजिज़ा क़ुरआन मजीद है। जो लोग इस ज़िंदा और ला-जवाब कलाम को देखकर भी ईमान न लाएं, वे किसी दूसरे मौजिज़े को देखकर भी हरगिज़ ईमान नहीं लाएंगे।
पिछले अम्बिया के मौजिज़ात वक़्ती थे और उनके जाने के बाद सिर्फ़ तारीख़ का हिस्सा बन गए, मगर क़ुरआन करीम क़यामत तक पढ़ा जाने वाला और अपनी हक़्क़ानियत का लोहा मनवाने वाला मौजिज़ा है जो हर दौर में तरोताज़ा है।
क़ुरआन पाक तमाम जहानों के लिए हिदायत है, मगर इससे सच्चा फ़ायदा, रहमत और दिली सुकून वही लोग हासिल करते हैं जो इस पर ईमान लाते हैं और अपनी ज़िंदगी इसके सांचे में ढालते हैं।
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