Transliteration: (Yaa 'ibaadiyal lazeena aamanooo inna ardee waasi 'atun fa iyyaaya fa'budoon)
"ऐ मेरे ईमान वाले बंदो! बेशक मेरी ज़मीन बहुत कुशादा (विशाल) है [140], पस तुम मेरी ही इबादत करो [141]।"
यह आयत मक्का के उन कमज़ोर और मज़लूम मुसलमानों के हक़ में नाज़िल हुई जो काफ़िरों के ज़ुल्म की वजह से खुल कर इबादत नहीं कर पा रहे थे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर किसी बस्ती में दीन पर अमल करना मुम्किन न रहे, तो अल्लाह की ज़मीन बहुत वसीअ है, वहाँ से हिजरत कर जाओ।
जब किसी जगह ईमान और इबादत पर पहरे लग जाएं तो अपने दीन को बचाने के लिए हिजरत करना वाजिब हो जाता है। वतन की मोहब्बत या माल-ओ-दौलत के ख़ौफ़ से कुफ़्र के माहौल में दबे रहना और दीन छोड़ देना जायज़ नहीं। ईमान की हिफ़ाज़त हर चीज़ पर मुक़द्दम है।
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