कुरान - 29:56 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
يَٰعِبَادِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ أَرۡضِي وَٰسِعَةٞ فَإِيَّـٰيَ فَٱعۡبُدُونِ

Transliteration: (Yaa 'ibaadiyal lazeena aamanooo inna ardee waasi 'atun fa iyyaaya fa'budoon)

ऐ मेरे ईमान वाले बंदो! बेशक मेरी ज़मीन बहुत कुशादा (विशाल) है [140], पस तुम मेरी ही इबादत करो [141]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 56

"ऐ मेरे ईमान वाले बंदो! बेशक मेरी ज़मीन बहुत कुशादा (विशाल) है [140], पस तुम मेरी ही इबादत करो [141]।"

[140] अल्लाह की ज़मीन वसीअ है (हिजरत की तरग़ीब)

यह आयत मक्का के उन कमज़ोर और मज़लूम मुसलमानों के हक़ में नाज़िल हुई जो काफ़िरों के ज़ुल्म की वजह से खुल कर इबादत नहीं कर पा रहे थे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर किसी बस्ती में दीन पर अमल करना मुम्किन न रहे, तो अल्लाह की ज़मीन बहुत वसीअ है, वहाँ से हिजरत कर जाओ।

[141] ख़ालिस इबादत के लिए हिजरत का फ़रीज़ा

जब किसी जगह ईमान और इबादत पर पहरे लग जाएं तो अपने दीन को बचाने के लिए हिजरत करना वाजिब हो जाता है। वतन की मोहब्बत या माल-ओ-दौलत के ख़ौफ़ से कुफ़्र के माहौल में दबे रहना और दीन छोड़ देना जायज़ नहीं। ईमान की हिफ़ाज़त हर चीज़ पर मुक़द्दम है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now