कुरान - 29:6 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

6
وَمَن جَٰهَدَ فَإِنَّمَا يُجَٰهِدُ لِنَفۡسِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ

Transliteration: (Wa man jaahada fainnamaa yujaahidu linafsih; innal laaha laghaniyyun 'anil 'aalameen)

और जो कोई कोशिश (जिहाद) करता है [10], तो वह अपनी ही ज़ात के भले के लिए कोशिश करता है; बेशक अल्लाह तमाम जहानों से बे-नियाज़ है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 6

"और जो कोई कोशिश (जिहाद) करता है [10], तो वह अपनी ही ज़ात के भले के लिए कोशिश करता है; बेशक अल्लाह तमाम जहानों से बे-नियाज़ है।"

[10] जिहाद और मुजाहिदे का नफ़ा ख़ुद बंदे के लिए

बंदा अल्लाह की राह में जो भी कोशिश, नफ़्स से मुजाहिदा, या कुफ़्र के ख़िलाफ़ जिहाद करता है, उसका पूरा फ़ायदा ख़ुद उसी को दुनिया व आख़िरत में हासिल होता है। अल्लाह तआला बंदों की इबादत या जिहाद का मोहताज नहीं, वह तमाम आलमों से बे-नियाज़ (ग़नी) है।

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