कुरान - 29:4 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
أَمۡ حَسِبَ ٱلَّذِينَ يَعۡمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَسۡبِقُونَاۚ سَآءَ مَا يَحۡكُمُونَ

Transliteration: (Am hasibal lazeena ya'maloonas sayyiaati any yasbiqoonaa; saaa'a maa yahkumoon)

क्या उन लोगों ने जो बुरे काम करते हैं यह समझ रखा है कि वे हमसे बच निकलेंगे [6]? कैसा बुरा फ़ैसला है जो वे करते हैं [7]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 4

"क्या उन लोगों ने जो बुरे काम करते हैं यह समझ रखा है कि वे हमसे बच निकलेंगे [6]? कैसा बुरा फ़ैसला है जो वे करते हैं [7]!"

[6] बदकारों का इलाही पकड़ से बे-ख़ौफ़ होना

मुशरिकीन और ज़ालिम जो अहले ईमान पर ज़ुल्म ढाते हैं, क्या वे यह गुमान करते हैं कि वे अल्लाह की पकड़ से भाग निकलेंगे या अल्लाह को आजिज़ कर देंगे? हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़ुदरत हर शै पर मुहीत है।

[7] बातिल और गुमराह सोच

उनका यह सोचना कि वे जो चाहें करते रहें और कोई बाज़पुर्स न होगी, इंतिहाई बातिल और बुरा फ़ैसला है। अल्लाह तआला ज़ालिमों को मोहलत ज़रूर देता है मगर छोड़ता नहीं।

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