कुरान - 29:2 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
أَحَسِبَ ٱلنَّاسُ أَن يُتۡرَكُوٓاْ أَن يَقُولُوٓاْ ءَامَنَّا وَهُمۡ لَا يُفۡتَنُونَ

Transliteration: (Ahasiban naasu any yutrakooo any yaqoolooo aamannaa wa hum la yuftanoon)

क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे सिर्फ़ इतना कहने पर छोड़ दिए जाएंगे कि 'हम ईमान लाए,' [1] और उनकी आज़माइश नहीं की जाएगी [2]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 2

"क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे सिर्फ़ इतना कहने पर छोड़ दिए जाएंगे कि 'हम ईमान लाए,' [1] और उनकी आज़माइश नहीं की जाएगी [2]?"

[1] ईमान का ज़बानी दावा और आज़माइश

यह आयत मुहाजिरीने मक्का और उन सहाबा-ए-किराम के हक़ में नाज़िल हुई जिन्हें इस्लाम लाने के बाद मुशरिकीन-ए-मक्का की तरफ़ से शदीद तकालीफ़, ज़ुल्म और सख़्तियों का सामना करना पड़ा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि सिर्फ़ ज़बानी तौर पर कलिमा पढ़ लेना काफ़ी नहीं, बल्कि ईमान का इम्तिहान और आज़माइश लाज़िमी है।

[2] आज़माइश की हिकमत

आज़माइश से सच्चे और मुख़्लिस मोमिन का ईमान निखर कर सामने आता है और मुनाफ़िक़ों का खोट ज़ाहिर हो जाता है। जिस तरह सोने को आग में तपाकर कुंदन बनाया जाता है, उसी तरह मोमिन को आज़माइशों से गुज़ार कर उसका मर्तबा बुलंद किया जाता है।

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