Transliteration: (Wa laqad fatannal lazeena min qablihim fala ya'lamannal laahul lazeena sadaqoo wa la ya'lamannal kaazibeen)
"और बेशक हमने उन लोगों को भी आज़माया जो इनसे पहले थे; पस अल्लाह ज़रूर उन्हें ज़ाहिर फ़रमाएगा जो सच्चे हैं [4] और ज़रूर झूठों को भी ज़ाहिर फ़रमाएगा [5]।"
अल्लाह तआला के बाज़ मक़बूल बंदों को आरों से चीर दिया गया, बाज़ को लोहे की कंघियों से नोचा गया, बाज़ को आग में डाल दिया गया, और बाज़ को अपने बेटों को क़ुर्बान करने का हुक्म दिया गया।
फिर भी ये अज़ीम हस्तियाँ साबित-क़दम रहीं, और उन्होंने पहाड़ों जैसी मज़बूती और इस्तिक़ामत का मुज़ाहिरा किया। ये मिसालें इस बात की याद दिलाती हैं कि सच्चे ईमान के साथ हमेशा सख़्त इम्तिहानात रहे हैं।
यहाँ 'इल्म' का तर्जुमा 'देखना' (ज़ाहिर फ़रमाना) करना सबसे मुनासिब है। इसे इल्मे ज़ुहूर (ज़ाहिरी इल्म) कहा जाता है—क्योंकि अल्लाह का इल्म तो अज़ली और क़दीम (हमेशा से) है, मगर आमाल की गवाही उनके वुजूद में आने के बाद ज़ाहिर होती है।
बाज़ उलमा फ़रमाते हैं कि हक़ीक़त में अल्लाह को जानना उसके महबूब बंदों को पहचानना है। जिस तरह सोने को आग में तपाकर उसका खोट दूर किया जाता है, उसी तरह इम्तिहानों के ज़रिये ईमान की ख़ामियाँ जलकर ख़त्म हो जाती हैं।
ये इम्तिहानात अल्लाह के जानने के लिए नहीं हैं, बल्कि हमारे लिए हैं—ताकि हक़ और बातिल दुनिया पर वाज़ेह हो जाए।
इनका असल मक़सद यह है कि क़यामत के दिन किसी के अज्र या मर्तबे पर कोई एतिराज़ न कर सके।
मिसाल: जब इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को जन्नती जवानों की सरदारी अता की जाएगी, तो कोई उन पर सवाल नहीं उठा सकेगा—कर्बला ने उनके मक़ाम और बुलंदी को दिन की रौशनी की तरह वाज़ेह कर दिया है।
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