कुरान - 29:8 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

8
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حُسۡنٗاۖ وَإِن جَٰهَدَاكَ لِتُشۡرِكَ بِي مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٞ فَلَا تُطِعۡهُمَآۚ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Wa wassainal insaana biwaalidaihi husnanw wa in jaahadaaka litushrika bee maa laisa laka bihee 'ilmun falaa tuti'humaa; ilaiya marji'ukum fa unabbi'ukum bimaa kuntum ta'maloon)

और हमने इंसान को अपने वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक की ताकीद की है [13]; लेकिन अगर वे तुझ पर ज़ोर डालें कि तू मेरे साथ किसी ऐसी चीज़ को शरीक ठहराए जिसका तुझे कोई इल्म नहीं [14], तो उनकी बात न मान [15]; मेरी ही तरफ़ तुम्हारा पलटना है, फिर मैं तुम्हें बताऊँगा जो कुछ तुम करते थे [16]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 8 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 8

"और हमने इंसान को अपने वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक की ताकीद की है [13]; लेकिन अगर वे तुझ पर ज़ोर डालें कि तू मेरे साथ किसी ऐसी चीज़ को शरीक ठहराए जिसका तुझे कोई इल्म नहीं [14], तो उनकी बात न मान [15]; मेरी ही तरफ़ तुम्हारा पलटना है, फिर मैं तुम्हें बताऊँगा जो कुछ तुम करते थे [16]।"

[13] शाने नुज़ूल और हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास का वाक़िआ

यह आयत हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु के हक़ में नाज़िल हुई जो अपनी माँ के इंतिहाई फ़रमांबरदार थे। जब वे मुसलमान हुए तो उनकी काफ़िरा माँ ने क़सम खाई कि जब तक तू मुहम्मद (ﷺ) का दीन नहीं छोड़ेगा, मैं न कुछ खाऊँगी, न पियूँगी और न साए में बैठूँगी। हज़रत साद ने फ़रमाया: 'ऐ अम्मां! अगर तेरी सौ जानें भी हों और एक-एक करके निकलें, तब भी मैं अपना दीन नहीं छोड़ सकता।' (ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)

[14] वालिदैन की इताअत की हदबंदी

वालिदैन की ख़िदमत और हुस्ने सुलूक हर हाल में फ़र्ज़ है, चाहे वे काफ़िर ही क्यों न हों। लेकिन अगर वे कुफ़्र, शिर्क या गुनाह का हुक्म दें तो उनकी इताअत हरगिज़ जायज़ नहीं, क्योंकि हदीस में फ़रमाया: "ख़ालिक़ की नाफ़रमानी में किसी मख़लूक़ की इताअत नहीं।"

[15] शिर्क में किसी की पैरवी नहीं

जब वालिदैन, जिनका मर्तबा दुनियावी रिश्तों में सबसे बड़ा है, शिर्क के हुक्म पर नहीं माने जा सकते, तो किसी पीर, उस्ताद या हाकिम की बात गुनाह में कैसे मानी जा सकती है!

[16–17] दीन को तमाम रिश्तों पर मुक़द्दम रखना

आख़िरकार सबको अल्लाह ही की बारगाह में पेश होना है जहाँ हर एक के ईमान और अमल का हिसाब होगा, इसलिए दुनियावी रिश्तों की ख़ातिर अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं की जा सकती।

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