कुरान - 29:64 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

64
وَمَا هَٰذِهِ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَآ إِلَّا لَهۡوٞ وَلَعِبٞۚ وَإِنَّ ٱلدَّارَ ٱلۡأٓخِرَةَ لَهِيَ ٱلۡحَيَوَانُۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa maa haazihil hayaa tud dunyaaa illaa lahwunw-wa la'ib; wa innad Daaral Aakhirata la hiyal ha yawaan; law kaano ya'lamoon)

और यह दुनियावी ज़िंदगी तो खेल और तफ़रीह (दिल बहलाने) के सिवा कुछ नहीं [154]; और बेशक आख़िरत का घर ही असल ज़िंदगी है [155]; काश कि वे जानते! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 64 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 64

"और यह दुनियावी ज़िंदगी तो खेल और तफ़रीह (दिल बहलाने) के सिवा कुछ नहीं [154]; और बेशक आख़िरत का घर ही असल ज़िंदगी है [155]; काश कि वे जानते!"

[154] दुनियावी ज़िंदगी की बेसबाती

यह दुनियावी ज़िंदगी फ़ानी और नापायदार है। जो शख़्स सिर्फ़ दुनिया की लज़्ज़तों में खो गया, उसकी मिसाल बच्चों के उस खेल जैसी है जो थोड़ी देर दिल बहलाने के बाद ख़त्म हो जाता है और हाथ कुछ नहीं आता। हाँ, अगर दुनिया को आख़िरत की खेती बनाकर इस्तेमाल किया जाए तो यही दुनिया अज्र-ओ-सवाब का ज़रिया बन जाती है।

[155] आख़िरत ही हक़ीक़ी और दायमी ज़िंदगी

असल और हमेशा रहने वाली ज़िंदगी आख़िरत की ज़िंदगी है जहाँ न मौत है, न बुढ़ापा, न ग़म और न ज़वाल। ईमान वाले की रूह मौत के बाद भी ज़िंदा रहती है और बरज़ख़ व आख़िरत में अल्लाह की कुर्बत की लज़्ज़तों से शादकाम होती है।

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