Transliteration: (Fa-izaa rakiboo fil fulki da'awul laaha mukhliseena lahud deena falammaa najjaa hum ilal barri izaa hum yushrikoon)
"फिर जब वे कश्ती में सवार होते हैं [156], तो अल्लाह को पुकारते हैं अपने दीन को उसी के लिए ख़ालिस करते हुए [157]; फिर जब वह उन्हें नजात देकर ख़ुश्की की तरफ़ ले आता है, तो अचानक वे शिर्क करने लगते हैं [158];"
जब मुशरिकीन कश्तियों में सवार होकर समंदर के तूफ़ानों और भयानक मौजों में घिर जाते हैं और मौत सामने नज़र आती है, तो उनके तमाम झूठे माबूदों का नशा उतर जाता है। वे अपने बुतों को उठाकर समंदर में फेंक देते थे क्योंकि वे जानते थे कि ये बेजान मूर्तियां किसी को नहीं बचा सकतीं।
उस सख़्त मुसीबत में वे अपने तमाम शिकवा-शिकायत और बुतों को छोड़कर सिर्फ़ एक अल्लाह को पुकारते हैं और उसी से दुआएं मांगते हैं। इंसान की फ़ितरत में यह बात दाख़िल है कि शदीद तकलीफ़ में उसका ज़मीर सच्चे ख़ुदा की तरफ़ मुतवज्जेह होता है।
लेकिन जैसे ही अल्लाह अपनी रहमत से उन्हें तूफ़ान से निकाल कर साहिल पर सही-सलामत पहुँचा देता है, वे फिर से अपने पुराने शिर्क और कुफ़्र की तरफ़ पलट जाते हैं और कहने लगते हैं कि हमें फ़लां देवी या देवता ने बचा लिया। यह इंतिहाई दर्जा की ना-शुक्री और मुनाफ़िक़त है।
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