Transliteration: (Awalam yaraw annaa ja'alnaa haraman aaminanw wa yutakhattafun naasu min haw lihim; afabil baatili yu'minoona wa bini'matil laahi yakfuroon)
"क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने एक अम्न वाला हरम बना दिया है [160], जबकि उनके गिर्द-ओ-पेश से लोग उचक लिए (लूटे व क़त्ल किए) जाते हैं [161]? तो क्या वे बातिल पर तो ईमान लाते हैं [162] और अल्लाह की नेमत की ना-शुक्री करते हैं?"
अल्लाह तआला ने मक्का मुकर्रमा और हरम-ए-पाक को एक ऐसा पुर-अम्न मक़ाम बनाया जहाँ इंसान तो क्या परिंदों और जानवरों का शिकार करना भी हराम है। पूरे अरब में क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी और लूट-मार का दौर-दौरा था, मगर अहले मक्का हरम की बरकत से बिल्कुल महफ़ूज़ और बे-ख़ौफ़ ज़िंदगी गुज़ारते थे।
मक्का के गिर्द-ओ-पेश में क़बीले एक दूसरे पर हमले करते थे, क़ाफ़िले लूटे जाते थे और लोग क़त्ल किए जाते थे, मगर हरम वालों पर कोई आँख उठाकर नहीं देख सकता था। यह अल्लाह का कितना बड़ा एहसान था।
इस अज़ीम नेमत और अम्न के बावजूद अहले मक्का बातिल बुतों पर ईमान रखते थे और अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत—यानी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की तशरीफ़-आवरी—की ना-शुक्री और मुख़ालिफ़त करते थे। अल्लाह की नेमतों का सबसे बेहतरीन शुक्र यह है कि रसूलुल्लाह ﷺ पर ईमान लाया जाए।
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