कुरान - 29:68 सूरह अल-अनकबूत अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

68
وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوۡ كَذَّبَ بِٱلۡحَقِّ لَمَّا جَآءَهُۥٓۚ أَلَيۡسَ فِي جَهَنَّمَ مَثۡوٗى لِّلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Wa man azlamu mimma nif taraa 'alal laahi kaziban aw kazzaba bilhaqqi lammaa jaaa'ah; alaisa fee jahannama maswal lil kaafireen)

और उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठा बोहतान बांधे [163] या हक़ को झुठलाए जब वह उसके पास आ चुका हो [164]? क्या काफ़िरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है [165]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनकबूत आयत 68 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंकबूत तफ़सीर - आयत 68

"और उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठा बोहतान बांधे [163] या हक़ को झुठलाए जब वह उसके पास आ चुका हो [164]? क्या काफ़िरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है [165]?"

[163] अल्लाह पर बोहतान तराशी

उससे बड़ा ज़ालिम कोई नहीं जो अल्लाह की तरफ़ झूठी बातें मंसूब करे—जैसे बुतों को अल्लाह का शरीक ठहराना, या फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियां कहना, या अपनी तरफ़ से झूठे अहकाम गढ़कर उन्हें शरीअत बताना।

[164] हक़ (रसूलुल्लाह ﷺ) की तकज़ीब

यहाँ "हक़" से मुराद क़ुरआन मजीद और ख़ुद हुज़ूर नबी-ए-रहमत ﷺ की ज़ात-ए-मुबारका है। जब हक़ तमाम वाज़ेह दलीलों और मौजिज़ात के साथ उनके सामने आ गया, तो जिन्होंने हठधर्मी से उसका इंकार किया, उन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म की इन्तिहा कर दी। हुज़ूर ﷺ मुजस्सम हक़ हैं और आपका हर क़ौल-ओ-फ़ेल ऐन हक़ है।

[165] काफ़िरों का ठिकाना जहन्नुम

जो लोग जान-बूझकर अल्लाह पर बोहतान बांधते हैं और उसके सच्चे रसूल की तकज़ीब करते हैं, उनका आख़िरी ठिकाना जहन्नुम की आग है जहाँ वे हमेशा ज़िल्लत और अज़ाब में मुब्तला रहेंगे।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now