Transliteration: (Wa laqad khalaqnaakum summa sawwarnaakum summa qulnaa lilmalaaa'ikatis judoo li Aadama fa-sajadooo illaaa Ibleesa lam yakum minas saajideen)
इससे मालूम हुआ कि नेक बंदों के काम भी अल्लाह तआला की तरफ़ मंसूब होते हैं। माँ के पेट में नطف़े को रूप देने का काम फ़रिश्तों के ज़रिए होता है, लेकिन अल्लाह तआला उसे अपना काम कहता है। अगर इसका सम्बंध हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लिया जाए, जैसा कि आगे का सिलसिला दिखा रहा है, तो यह अल्लाह का सीधा काम है, क्योंकि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से बनाया और उन्हें इंसान कहा—यानी अल्लाह की तदबीर और हिकमत से बनी सृष्टि।
इससे पता चला कि यह सज्दा इज़्ज़त और तक़रीम का सज्दा था, और यह सिर्फ़ हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के लिए ख़ास था। अगर यह सज्दा अल्लाह के लिए होता और आदम महज़ क़िब्ला बनाए जाते, तो लफ़्ज़ "अल्लाह को" आता, न कि "आदम को"। इसलिए सम्मान का सज्दा शिर्क नहीं है। लेकिन शरीअत-ए-मुहम्मदी में अब ऐसा सज्दा हराम कर दिया गया है।
इससे मुराद यह है कि इब्लीस सज्दा करने वाले फ़रिश्तों की जमाअत में शामिल न हुआ, क्योंकि उसने इसे लाज़िम नहीं समझा। यहाँ से यह सबक़ मिलता है कि कोई शख़्स सिर्फ़ नमाज़ छोड़ देने से इस्लाम से बाहर नहीं होता, हाँ अगर कोई नमाज़ को फ़र्ज़ मानने से इंकार करे, तो वह दायर-ए-इस्लाम से बाहर हो जाता है।
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