और उनसे उस समुद्र किनारे वाली बस्ती [372] के बारे में पूछो, जब उन्होंने सब्त (शनिवार) के हुक्म की खिलाफ़वर्ज़ी की। उनकी मछलियाँ उनके सामने साफ़-साफ़ शनिवार के दिन सतह पर आ जातीं, और जिस दिन सब्त न होता, तो उनके पास न आतीं। इस तरह हमने उन्हें उनकी नाक़सी की वजह से आज़माया [374]।
यह बस्ती इलाह कहलाती थी, जो मदयन और सीनाई के दरमियान थी। कुछ मुफस्सिरीन ने इसे तिब्रिया (सीरिया) या मदयन भी बताया है। यहां के लोग मछली पकड़कर गुज़ारा करते थे। अल्लाह ने उन्हें हुक्म दिया कि शनिवार को मछली पकड़ना हराम है, मगर अल्लाह की ओर से आज़माइश यह थी कि उसी दिन मछलियाँ सबसे ज़्यादा सतह पर नज़र आतीं और दूसरे दिनों कम। उन्होंने सब्र खो दिया और शनिबार को मछली पकड़ने लगे।
यहूदियों के लिए शनिवार का दिन मुक़द्दस था, जैसे मुसलमानों के लिए जुमे का दिन। उस दिन शिकार और तिजारत मना थी। इस्लाम में अल्लाह ने आसानी फ़रमाई — मुसलमानों पर सिर्फ़ जुमे की नमाज़ के वक्त कारोबार रोकना लाज़मी किया गया, और वह भी सिर्फ़ उन्हीं पर जिन पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ है।
इस बस्ती के लोग तीन हिस्सों में बंट गए:
यह वाक़िआ इस बात का बड़ा सबक़ है कि अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करने वाले और खामोश तमाशाई बनने वाले दोनों सख़्त गिरफ़्त में आ सकते हैं।
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सूरह अल-आराफ आयत 163 तफ़सीर