कुरान - 7:163 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

163
وَسۡـَٔلۡهُمۡ عَنِ ٱلۡقَرۡيَةِ ٱلَّتِي كَانَتۡ حَاضِرَةَ ٱلۡبَحۡرِ إِذۡ يَعۡدُونَ فِي ٱلسَّبۡتِ إِذۡ تَأۡتِيهِمۡ حِيتَانُهُمۡ يَوۡمَ سَبۡتِهِمۡ شُرَّعٗا وَيَوۡمَ لَا يَسۡبِتُونَ لَا تَأۡتِيهِمۡۚ كَذَٰلِكَ نَبۡلُوهُم بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُونَ

Transliteration: (Was'alhum 'anil qaryatil latee kaanat haadiratal bahri iz ya'doona fis Sabti iz ta'teehim heetaanuhum yawma Sabtihim shurra'anw wa yawma laa yasbitoona laa ta'teehim; kazaalika nabloohum bimaa kaanoo yafsuqoon)

और उनसे उस समुद्र किनारे वाली बस्ती [372] के बारे में पूछो, जब उन्होंने सब्त (शनिवार) के हुक्म की खिलाफ़वर्ज़ी की। उनकी मछलियाँ उनके सामने साफ़-साफ़ शनिवार के दिन सतह पर आ जातीं, और जिस दिन सब्त न होता, तो उनके पास न आतीं। इस तरह हमने उन्हें उनकी नाक़सी की वजह से आज़माया [374]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 163 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-आ‘राफ़ – आयत 163 की तफ़्सीर

✅ [372] समुद्री बस्ती और उसकी आज़माइश

यह बस्ती इलाह कहलाती थी, जो मदयन और सीनाई के दरमियान थी। कुछ मुफस्सिरीन ने इसे तिब्रिया (सीरिया) या मदयन भी बताया है। यहां के लोग मछली पकड़कर गुज़ारा करते थे। अल्लाह ने उन्हें हुक्म दिया कि शनिवार को मछली पकड़ना हराम है, मगर अल्लाह की ओर से आज़माइश यह थी कि उसी दिन मछलियाँ सबसे ज़्यादा सतह पर नज़र आतीं और दूसरे दिनों कम। उन्होंने सब्र खो दिया और शनिबार को मछली पकड़ने लगे।

✅ [373] सब्त (शनिवार) की पवित्रता

यहूदियों के लिए शनिवार का दिन मुक़द्दस था, जैसे मुसलमानों के लिए जुमे का दिन। उस दिन शिकार और तिजारत मना थी। इस्लाम में अल्लाह ने आसानी फ़रमाई — मुसलमानों पर सिर्फ़ जुमे की नमाज़ के वक्त कारोबार रोकना लाज़मी किया गया, और वह भी सिर्फ़ उन्हीं पर जिन पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ है।

✅ [374] तीन तबक़ों का रवैया और सबक़

इस बस्ती के लोग तीन हिस्सों में बंट गए:

  1. खिलाफ़वर्ज़ लोग – जिन्होंने शनिबार को मछली पकड़कर अल्लाह की नाफ़रमानी की।
  2. नाहियों का गिरोह – जिन्होंने मछली पकड़ने से परहेज़ किया और गुनहगारों को रोकने की कोशिश की। बाद में उन्होंने गुनहगारों से अलग होकर उनके और अपने बीच एक दीवार खड़ी कर ली।
  3. खामोश रहने वाले – जिन्होंने न खुद गुनाह किया, न रोकने की कोशिश की।

यह वाक़िआ इस बात का बड़ा सबक़ है कि अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करने वाले और खामोश तमाशाई बनने वाले दोनों सख़्त गिरफ़्त में आ सकते हैं।

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