कुरान - 7:164 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

164
وَإِذۡ قَالَتۡ أُمَّةٞ مِّنۡهُمۡ لِمَ تَعِظُونَ قَوۡمًا ٱللَّهُ مُهۡلِكُهُمۡ أَوۡ مُعَذِّبُهُمۡ عَذَابٗا شَدِيدٗاۖ قَالُواْ مَعۡذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمۡ وَلَعَلَّهُمۡ يَتَّقُونَ

Transliteration: (Wa iz qaalat ummatum minhum lima ta'izoona qaw manil laahu muhlikuhum aw mu'azzibuhum 'azaaban shadeedan qaaloo ma'ziratan ilaa Rabbikum wa la'allahum yattaqoon)

और जब उनमें से एक गिरोह ने कहा [375]: "तुम उन लोगों को क्यों समझाते हो जिनको अल्लाह हलाक करने वाला है या उन्हें सख़्त अज़ाब देने वाला है [376]?" उन्होंने कहा: "ताकि हम अपने रब के सामने उज़्र पेश कर सकें, और शायद वह लोग परहेज़गार बन जाएं।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 164 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-आ‘राफ़ – आयत 164 की तफ़्सीर

✅ [375] खामोश गिरोह की उलझन

यह आयत उसी तीसरे गिरोह की तरफ़ इशारा करती है, जो न खुद गुनाह करते थे, न रोकते थे। उन्होंने नाहियों (रोकने वालों) से कहा कि ऐसे लोगों को समझाने का क्या फ़ायदा, जिन्हें अल्लाह जल्द ही हलाक या अज़ाब देने वाला है। लेकिन उनका ये रवैया गुनाह से नफरत को भी दर्शाता है, बस उनमें हिम्मत की कमी थी।

✅ [376] नसीहत का असल मक़सद

इससे सबक़ मिलता है कि नसीहत करना फ़र्ज़ की अदा और अज्र का बाइस है, चाहे सामने वाले के सुधरने की उम्मीद कम ही क्यों न हो। नाहियों ने जवाब दिया:

  1. हम नसीहत करेंगे ताकि अल्लाह के सामने उज़्र पेश कर सकें कि हमने कोशिश की।
  2. शायद इन गुनहगारों के दिल में तौबा और परहेज़गारी पैदा हो जाए।

यह हमें सिखाता है कि बुराई के खिलाफ़ बोलना और नसीहत करना कभी भी बेकार नहीं जाता।

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