Transliteration: (Wa iz qaalat ummatum minhum lima ta'izoona qaw manil laahu muhlikuhum aw mu'azzibuhum 'azaaban shadeedan qaaloo ma'ziratan ilaa Rabbikum wa la'allahum yattaqoon)
यह आयत उसी तीसरे गिरोह की तरफ़ इशारा करती है, जो न खुद गुनाह करते थे, न रोकते थे। उन्होंने नाहियों (रोकने वालों) से कहा कि ऐसे लोगों को समझाने का क्या फ़ायदा, जिन्हें अल्लाह जल्द ही हलाक या अज़ाब देने वाला है। लेकिन उनका ये रवैया गुनाह से नफरत को भी दर्शाता है, बस उनमें हिम्मत की कमी थी।
इससे सबक़ मिलता है कि नसीहत करना फ़र्ज़ की अदा और अज्र का बाइस है, चाहे सामने वाले के सुधरने की उम्मीद कम ही क्यों न हो। नाहियों ने जवाब दिया:
यह हमें सिखाता है कि बुराई के खिलाफ़ बोलना और नसीहत करना कभी भी बेकार नहीं जाता।
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