या (यह बहाना न करो कि) “हमारे बाप-दादा हमसे पहले शिर्क करते रहे और हम तो उनके बाद बस उनकी औलाद थे। तो क्या तू हमें उस चीज़ पर हलाक करेगा जो झूटे लोग करते थे?” [400]
इस आयत में साफ़ कर दिया गया कि जब सब रूहों से तौहीद का एहद लिया जा चुका है, तो कोई अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। अगर कोई कहे: “हम तो अपने बाप-दादाओं के रास्ते पर चले थे,” तो यह दलील क़बूल नहीं होगी।
क्योंकि हर शख़्स ने खुद अल्लाह की वहदानीयत की गवाही दी थी। इसलिए जाहिलाना तौर पर बाप-दादाओं की अंधी पैरवी (ताक़लीद) करना हुज्जत नहीं बन सकता। दीन को इल्म और यक़ीन के साथ अपनाना फ़र्ज़ है, न कि सिर्फ़ मीरास के तौर पर।
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सूरह अल-आराफ आयत 173 तफ़सीर