Transliteration: (Wa iz akhaza Rabbuka min Baneee Aadama min zuhoorihim zurriyyatahum wa ashhadahum 'alaa anfusihim alastu bi Rabbikum qaaloo balaa shahidnaaa; an taqooloo Yawmal Qiyaamati innaa kunnaa 'an haazaa ghaafileen)
इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने हज़रत आदम अ़ै० की कमर से क़ियामत तक आने वाली सारी औलाद को रूहानी शक्ल में पैदा किया। उस वक़्त इंसान ऐसे थे जैसे अनगिनत चींटियाँ, और पूरी इंसानियत अपने अस्ल के साथ मौजूद थी।
अल्लाह तआला ने उनके दिलों में अपनी तौहीद डाल दी और उनसे आपस में गवाही ली कि वही उनका रब है। यह सिर्फ़ सामूहिक इकरार नहीं था, बल्कि एक रूहानी एहद था, जिसमें अंदरूनी यक़ीन और बाहरी गवाही दोनों शामिल थे।
यह एहद सारी रूहों से लिया गया — नबियों, औलिया, मोमिनों, मुनाफ़िक़ों और कुफ़्फ़ार सभी से। सबसे पहले “हाँ” कहने वाले हज़रत मुहम्मद ﷺ थे। फिर नबियों ने कहा, फिर नेक बंदों ने और आखिर में बाक़ी इंसानों ने। मोमिनों ने इसे खुशी से कबूल किया और कुफ़्फ़ार ने मजबूरी से, लेकिन यह एहद सब पर लाज़िम हुआ।
इस गवाही की वजह से कोई यह बहाना नहीं कर सकेगा कि वह तौहीद से बेख़बर था। हालाँकि इंसान को यह बात याद नहीं, लेकिन अल्लाह ने अपने नबियों और वही के ज़रिये इस एहद को याद दिलाया। जैसे माँ अपने बच्चे को बचपन की भूली बातें याद दिलाती है और बच्चा मान लेता है। इस तरह, अल्लाह ने हक़ को वाज़ेह कर दिया ताकि इन्कार का कोई रास्ता न बचे।
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