कुरान - 7:176 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

176
وَلَوۡ شِئۡنَا لَرَفَعۡنَٰهُ بِهَا وَلَٰكِنَّهُۥٓ أَخۡلَدَ إِلَى ٱلۡأَرۡضِ وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُۚ فَمَثَلُهُۥ كَمَثَلِ ٱلۡكَلۡبِ إِن تَحۡمِلۡ عَلَيۡهِ يَلۡهَثۡ أَوۡ تَتۡرُكۡهُ يَلۡهَثۚ ذَّـٰلِكَ مَثَلُ ٱلۡقَوۡمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَاۚ فَٱقۡصُصِ ٱلۡقَصَصَ لَعَلَّهُمۡ يَتَفَكَّرُونَ

Transliteration: (Wa law shi'naa larafa'naahu bihaa wa laakin nahooo akhlada ilal ardi wattaba'a hawaah; famasaluhoo kamasalil kalbi in tahmil 'alaihi yalhas aw tatruk hu yalhas; zaalika masalul qawmil lazeena kazzaboo bi Aayaatinaa; faqsusil qasasa la'allahum yatafakkaroon)

और अगर हम चाहते तो उसे अपनी आयतों से ऊँचा उठा देते [405], मगर वह तो ज़मीन से लिपट गया और अपनी ख़्वाहिशात के पीछे चला [406]। तो उसकी मिसाल उस कुत्ते जैसी है, कि तुम उस पर चढ़ो तो भी हांफता है और उसे छोड़ दो तो भी हांफता है [407]। यही मिसाल उन लोगों की है जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया। तो (ऐ महबूब) यह क़िस्से सुनाइए, ताकि वे ग़ौर करें [408]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 176 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ़राफ़ – आयत 176 की तफ़्सीर

✅ [405] इल्म और रुतबा बर्बाद करना

यहाँ वाज़ेह किया गया कि सिर्फ़ इल्म होना इंसान को बुलंद नहीं करता, बल्कि इख़्लास और ताअत से ही ऊँचाई मिलती है। जैसे बलआम बिन बाॊरा को इल्म दिया गया था, मगर उसने अमल और सच्चाई छोड़ दी, इसलिए उसका इल्म उसे फ़ायदा न दे सका।

✅ [406] दुनिया और ख्वाहिशात का ग़ुलाम

उसने अल्लाह की किताब से ऊँचा उठने के बजाय दुनियावी लालच और शहवात का रास्ता चुना। असल आलिम वही है जो ख़्वाहिशात का ग़ुलाम न बने और अपने इल्म को दीन की ख़िदमत में लगाए।

✅ [407] कुत्ते की मिसाल

अल्लाह ने उसकी हालत की मिसाल कुत्ते से दी — चाहे उसे भगाओ या छोड़ दो, वह हर हाल में हांफता है। इसी तरह वह शख़्स हर हाल में बेसक़ून रहता है, न हक़ में आराम पाता है न गुमराही में। यह सबसे बड़ी रुसवाई है कि इल्म होते हुए भी इंसान गुमराह हो।

✅ [408] हर दौर के लिए चेतावनी

यह मिसाल सिर्फ़ एक शख़्स की नहीं, बल्कि क़ियामत तक आने वालों के लिए चेतावनी है। ऐसे लोग हर दौर में पैदा होंगे जो इल्म का ग़लत इस्तेमाल करेंगे और हक़ का इन्कार करेंगे। अल्लाह ने नबी ﷺ को हुक्म दिया कि यह क़िस्से सुनाएँ ताकि लोग सोचें-समझें और सही राह अपनाएँ।

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