Transliteration: (Wa laqad zara'naa li jahannama kaseeran minal jinni wal insi lahum quloobul laa yafqahoona bihaa wa lahum a'yunul laa yubisiroona bihaa wa lahum aazaanul laa yasma'oona bihaa; ulaaa'ika kal an'aami bal hum adall; ulaaa'ika humul ghaafiloon)
बहुत से जिन्न और इंसान अपने कुफ़्र और नाफ़रमानी की वजह से आखिरकार जहन्नम के हक़दार बनते हैं। उन्हें समझने, देखने और सुनने की ताक़त दी गई, मगर उन्होंने इन नेमतों को हक़ को पहचानने के बजाय गुमराही में खर्च किया।
इनके पास दिल हैं मगर हक़ को नहीं समझते, आँखें हैं मगर हक़ की निशानियों को नहीं देखते, और कान हैं मगर कुरआन की नसीहतें नहीं सुनते। असल में उनकी ये क़ाबिलियतें बेकार हो गईं, क्योंकि उन्होंने उन्हें सही मक़सद के लिए इस्तेमाल नहीं किया।
जानवर अपने फ़ितरी हदूद से बाहर नहीं निकलते, मगर इंसान जब हक़ से मुँह मोड़ लेता है तो वह जानवरों से भी नीचे गिर जाता है। क्योंकि जानवर बे-इल्म होते हैं, लेकिन इंसान इल्म होते हुए भी अल्लाह की हिदायत को ठुकराता है।
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