कुरान - 7:179 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

179
وَلَقَدۡ ذَرَأۡنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِۖ لَهُمۡ قُلُوبٞ لَّا يَفۡقَهُونَ بِهَا وَلَهُمۡ أَعۡيُنٞ لَّا يُبۡصِرُونَ بِهَا وَلَهُمۡ ءَاذَانٞ لَّا يَسۡمَعُونَ بِهَآۚ أُوْلَـٰٓئِكَ كَٱلۡأَنۡعَٰمِ بَلۡ هُمۡ أَضَلُّۚ أُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡغَٰفِلُونَ

Transliteration: (Wa laqad zara'naa li jahannama kaseeran minal jinni wal insi lahum quloobul laa yafqahoona bihaa wa lahum a'yunul laa yubisiroona bihaa wa lahum aazaanul laa yasma'oona bihaa; ulaaa'ika kal an'aami bal hum adall; ulaaa'ika humul ghaafiloon)

बेशक हमने बहुत से जिन्न [410] और इंसानों को जहन्नम के लिए पैदा किया है। उनके पास दिल हैं लेकिन वे उनसे समझते नहीं, उनके पास आँखें हैं लेकिन वे उनसे देखते नहीं, और उनके पास कान हैं लेकिन वे उनसे सुनते नहीं [411]। वे तो चारपायों की तरह हैं, बल्कि उनसे भी ज़्यादा गुमराह हैं [412]। यही लोग हैं जो ग़फ़लत में पड़े रहते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 179 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ़राफ़ – आयत 179 की तफ़्सीर

✅ [410] जहन्नम के लिए तैयार किए गए

बहुत से जिन्न और इंसान अपने कुफ़्र और नाफ़रमानी की वजह से आखिरकार जहन्नम के हक़दार बनते हैं। उन्हें समझने, देखने और सुनने की ताक़त दी गई, मगर उन्होंने इन नेमतों को हक़ को पहचानने के बजाय गुमराही में खर्च किया।

✅ [411] दिल, आँख और कान का ग़लत इस्तेमाल

इनके पास दिल हैं मगर हक़ को नहीं समझते, आँखें हैं मगर हक़ की निशानियों को नहीं देखते, और कान हैं मगर कुरआन की नसीहतें नहीं सुनते। असल में उनकी ये क़ाबिलियतें बेकार हो गईं, क्योंकि उन्होंने उन्हें सही मक़सद के लिए इस्तेमाल नहीं किया।

✅ [412] जानवरों से भी ज़्यादा गुमराह

जानवर अपने फ़ितरी हदूद से बाहर नहीं निकलते, मगर इंसान जब हक़ से मुँह मोड़ लेता है तो वह जानवरों से भी नीचे गिर जाता है। क्योंकि जानवर बे-इल्म होते हैं, लेकिन इंसान इल्म होते हुए भी अल्लाह की हिदायत को ठुकराता है।

 

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