कुरान - 2:106 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

106
۞مَا نَنسَخۡ مِنۡ ءَايَةٍ أَوۡ نُنسِهَا نَأۡتِ بِخَيۡرٖ مِّنۡهَآ أَوۡ مِثۡلِهَآۗ أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ

Transliteration: (Maa nansakh min aayatin aw nunsihaa na-ti bikhairim minhaaa aw mislihaaa; alam ta'lam annal laaha 'alaa kulli shai'in qadeer)

"जब हम कोई आयत रद्द (मंसूख़) करते हैं [207] या उसे भुला देते हैं, तो हम उससे बेहतर [208] या उसके जैसी कोई और ले आते हैं [209]। क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है? [210]" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 106 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[207] नासिख़ (अभिन्यास हटाना) का इस्लामी तसव्वुर

  • ये आयत उन लोगों के जवाब में नाज़िल हुई जो क़ुरआन की कुछ आयतों के मंसूख़ होने पर ऐतराज़ करते थे,
    ख़ासकर यहूद और नसरानी जो कहते थे कि तौरात और इंजील में कोई आयत नहीं बदली गई।
  • नास्ख़ (Abrogation) इस्लामी शरीअत का इलाही उसूल है, और इसकी तीन क़िस्में हैं:
    1. तिलावत की मंसूखी — आयत अब पढ़ी नहीं जाती, मगर उसका हुक्म बाक़ी हो सकता है।
    2. हुक्म की मंसूखी — आयत क़ुरआन में मौजूद रहती है, मगर उसका शरीअती हुक्म ख़त्म।
    3. तिलावत और हुक्म दोनों की मंसूखी — आयत भी हटा दी जाती है, और उसका हुक्म भी ख़त्म।

[208] बेहतर चीज़ से तब्दील करना

  • जैसे क़ुरआन को तौरात और इंजील पर फ़ज़ीलत मिली,
    उसी तरह कुछ आयतें जब मंसूख़ होती हैं, तो अल्लाह उन्हें बेहतर, ज़्यादा हिकमत भरी,
    या सवाब में ऊंची आयतों से बदल देता है।
  • इससे ये भी साबित होता है कि इलाही रहनुमाई (guidance)
    एक ज़िंदा और लचकदार निज़ाम (dynamic system) है,
    जो उम्मत की ज़रूरतों के मुताबिक ताजगी के साथ आता है।

[209] आयतों की आपसी फ़ज़ीलत और मक़सद

  • क़ुरआन की हर आयत इलाही है, मगर उनकी फ़ज़ीलत और असर अलग-अलग हो सकता है।
  • मिसाल: सूरह इख़लास को तीन बार पढ़ना पूरे क़ुरआन के बराबर है।
    लेकिन सूरह लहब को 300 बार पढ़ना वैसा सवाब नहीं देता।
  • ये बताता है कि आयत की अहमियत उसके मक़सद, असर और हिकमत पर निर्भर करती है,
    न कि सिर्फ़ उसकी तिलावत पर।

[210] अल्लाह की क़ानून साज़ी पर मुकम्मल इख़्तियार

  • आख़िर में अल्लाह एक सवाल के ज़रिए समझाते हैं:
    "क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है?"
  • यानी अगर कोई हुक्म या आयत तब्दील हो रही है,
    तो ये इंतिशार (contradiction) नहीं बल्कि हिकमत और रहमत है।
  • जैसे एक डॉक्टर बीमारी की हालत के मुताबिक दवा बदलता है,
    वैसे ही अल्लाह भी इंसानों की हालत के मुताबिक हुक्म बदलते हैं —
    ये बदलाव रहमत है, न कि उलझन।

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