कुरान - 2:109 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

109
وَدَّ كَثِيرٞ مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ لَوۡ يَرُدُّونَكُم مِّنۢ بَعۡدِ إِيمَٰنِكُمۡ كُفَّارًا حَسَدٗا مِّنۡ عِندِ أَنفُسِهِم مِّنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلۡحَقُّۖ فَٱعۡفُواْ وَٱصۡفَحُواْ حَتَّىٰ يَأۡتِيَ ٱللَّهُ بِأَمۡرِهِۦٓۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ

Transliteration: (Wadda kaseerum min ahlil kitaabi law yaruddoo nakum mim ba'di eemaanikum kuffaaran hasadam min 'indi anfusihim mim ba'di maa tabaiyana lahumul haqqu fa'foo wasfahoo hattaa yaa tiyallaahu bi amrih; innal laaha 'alaa kulli shai'in qadeer)

"कितने ही किताब वालों ने चाहा कि वो तुम्हें ईमान लाने के बाद फिर से कुफ़्र की तरफ़ मोड़ दें — सिर्फ़ हसद (जलन) के कारण [215], जबकि हक़ उनके सामने वाज़ेह (स्पष्ट) हो चुका है। तो (ऐ मुसलमानों!) तुम उन्हें माफ़ कर दो और दरगुज़र करो, जब तक अल्लाह अपना हुक्म न भेजे [216]। बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 109 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[215] हसद — एक रूहानी बीमारी

  • इस आयत से मालूम होता है कि हसद (जलन) एक ख़तरनाक रूहानी बीमारी है,
    जो इंसान के ईमान को तबाह कर सकती है।
  • किताब वाले (यहूद व नसारा) — हक़ को अच्छी तरह जानने के बावजूद,
    महज़ जलन और हठ की वजह से चाहते थे कि मुसलमान फिर से गुमराह हो जाएं।
  • यही शैतान (इबलीस) का हाल था — जो आदम (अ.स) से जल कर लानती बन गया।

🛡️ दुआ:
अल्लाह हमें इस अंदरूनी बीमारी से महफ़ूज़ रखे।

📌 उहुद की लड़ाई के मौक़े पर, जब मुसलमानों को शिकस्त हुई,
तो यहूद मज़ाक उड़ाते हुए बोले:
"अगर तुम सच्चे होते, तो हारते क्यों?"
उस समय ये आयत नाज़िल हुई — ये बताने के लिए कि उनका जलन से भरा रवैया
किसी हक़ पर नहीं, बल्कि अंदरूनी बीमारी (हसद) की वजह से था।

[216] अस्थायी माफ़ी और बाद में जिहाद का हुक्म

  • इस आयत में अल्लाह ने हुक्म दिया कि इन हसद करने वालों को फ़िलहाल माफ़ कर दो,
    और उनके रवैये पर सब्र करो, जब तक अल्लाह का अगला हुक्म ना आए।
  • बाद में जब जिहाद के बारे में आयतें नाज़िल हुईं,
    तो ये सब सब्र और दरगुज़र की आयतें मंसूख़ (abrogated) हो गईं।

🔺 नुक्ता:
ये आयत इलाही शरीअत की तदरीजी तरबियत (gradual guidance) का हिस्सा है —
पहले सब्र और नर्मी, फिर जब ज़रूरत पड़ी तो हक़ के लिए जिहाद का हुक्म।

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