कुरान - 2:75 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

75
۞أَفَتَطۡمَعُونَ أَن يُؤۡمِنُواْ لَكُمۡ وَقَدۡ كَانَ فَرِيقٞ مِّنۡهُمۡ يَسۡمَعُونَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعۡدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Afatatma'oona ai yu'minoo lakum wa qad kaana fareequm minhum yasma'oona Kalaamal laahi summa yuharri foonahoo mim ba'di maa'aqaloohu wa hum ya'lamoon)

[75] (ऐ मुसलमानों!) क्या तुम यह चाहते हो कि ये (यहूदी) तुम पर ईमान ले आएँ? हालाँकि इन में से एक गिरोह ऐसा भी था जो अल्लाह की बात को सुनता, फिर उसे समझ लेने के बाद, जानबूझकर उसे बिगाड़ देता था [136]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 75 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[136]

इलाही किताबों में जानबूझकर फेरबदल:
यह आयत यहूदियों के उन आलिमों और रहबानों की तरफ इशारा करती है जो तौरेत और इंजील के जानकार थे। वे जानते थे कि इन किताबों में रसूल अल्लाह ﷺ की पहचान और खूबियाँ लिखी गई हैं। फिर भी उन्होंने इन्हें छिपाया या बदल दिया। यह आयत चेतावनी देती है कि जो लोग अल्लाह की किताबों में जानबूझकर बदलाव कर सकते हैं, उनसे यह उम्मीद करना कि वे सच्चाई को अपनाएँगे—यह ग़लत सोच है।

इसलिए मुसलमानों को सतर्क रहना चाहिए कि ऐसे लोग उनके विचारों में भी ग़लतियाँ ना पैदा कर दें, जैसे उन्होंने अपनी किताबों में किया।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now