कुरान - 2:76 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

76
وَإِذَا لَقُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٖ قَالُوٓاْ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمۡ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمۡۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Wa izaa laqul lazeena aamanoo qaalooo aamannaa wa izaakhalaa ba'duhum ilaa ba'din qaalooo atuhaddisoonahum bimaa fatahal laahu 'alaikum liyuhaajjookum bihee 'inda rabbikum; afalaa ta'qiloon)

[76] और जब वे ईमान वालों से मिलते हैं, तो कहते हैं: "हम ईमान लाए हैं", और जब वे आपस में एक-दूसरे के साथ अकेले होते हैं, तो कहते हैं: "क्या तुम उन्हें वह बात बताते हो जो अल्लाह ने तुम पर खोली है, ताकि वे तुम्हारे रब के पास उसके बारे में तुमसे तर्क करें? क्या तुम इतना भी नहीं समझते?" [137] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 76 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[137]

यहूदियों की मुनाफ़िक़त और सच्चाई को छिपाना:
इस आयत में उन यहूदियों का ज़िक्र है जो मुसलमानों से मिलकर कहते थे कि वे भी ईमान लाए हैं, लेकिन अकेले में अपने आलिमों और रहबानों से यह सुनते थे कि: "तुम मुसलमानों को अल्लाह की किताब की वह बातें क्यों बताते हो जो हमने सीखी हैं? अगर तुमने उन्हें बता दिया, तो वे क़यामत के दिन तुम्हारे ख़िलाफ़ अल्लाह से तर्क करेंगे।"

इससे उनकी मुनाफ़िक़त और सच्चाई को जानबूझकर छिपाने का रवैया सामने आता है। वे अल्लाह की नाज़िल की गई बातों को पहचानते थे, लेकिन उसे छिपाते थे सिर्फ़ इसलिए कि कहीं मुसलमान उनकी किताबों की बातें पकड़कर उन्हें शर्मिंदा न कर दें।

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