कुरान - 2:78 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

78
وَمِنۡهُمۡ أُمِّيُّونَ لَا يَعۡلَمُونَ ٱلۡكِتَٰبَ إِلَّآ أَمَانِيَّ وَإِنۡ هُمۡ إِلَّا يَظُنُّونَ

Transliteration: (Wa minhum ummiyyoona laa ya'lamoonal kitaaba illaaa amaaniyya wa in hum illaa yazunnoon)

[78] और उनमें से कुछ अनपढ़ हैं, जो किताब को नहीं जानते, मगर अपनी ख्वाहिशों के मुताबिक़ (बातें) जानते हैं, और वे तो सिर्फ़ कयास ही लगा रहे हैं। [139] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 78 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[139]

सिर्फ़ कयास पर नहीं, यक़ीन पर हो ईमान:
यह आयत उन यहूदियों की ओर इशारा करती है जो पढ़े-लिखे नहीं थे और अपनी आसमानी किताब की असल बातें नहीं जानते थे। वे अपनी मनघड़ंत सोच और ख्वाहिशों पर चल रहे थे।

इस्लाम यह सिखाता है कि सच्चा ईमान अंदाज़ों और अंधे अनुसरण पर नहीं, बल्कि हक़ीक़त और प्रमाण पर आधारित होना चाहिए। इसलिए यह आयत बताती है कि अंदाज़ों पर आधारित धर्म की कोई बुनियाद नहीं होती — सच्चाई को समझकर उस पर यक़ीन करना ही असली राह है।

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