Transliteration: (Laisa 'alal a'maa harajunw wa laa 'alal a'raji harajunw wa laa 'alal mareedi haraj' wa many yutil'il laaha wa Rasoolahoo yudkhilhu jannaatin tajree min tahtihal anhaaru wa many yatawalla yu'azzibhu 'azaaban aleemaa (section 2))
"न अंधे पर कोई हरज (गुनाह) है [47], न लंगड़े पर कोई हरज है, और न बीमार पर कोई हरज है [48]। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानेगा, अल्लाह उसे उन बाग़ों में दाख़िल फ़रमाएगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं [49], और जो कोई मुँह मोड़ेगा, तो वह उसे दर्दनाक अज़ाब देगा [50]!"
इस्लाम एक रहमत भरा और प्राकृतिक धर्म है। अल्लाह तआला ने उन लोगों को जिहाद में शामिल न होने पर पूरी छूट दी है जो किसी वास्तविक शारीरिक मजबूरी के कारण लाचार हैं—जैसे अंधा जिसे दिखाई न दे, लंगड़ा जो भाग या लड़ न सके।
इसी तरह जो व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी में मुब्तला हो, उस पर भी मैदान-ए-जंग में जाना फ़र्ज़ नहीं है। अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता।
जो लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के अहकाम की पैरवी करते हैं, अल्लाह उन्हें सदाबहार जन्नतों में आला मक़ाम अता फ़रमाएगा।
जो लोग बिना किसी मजबूरी के केवल दुनियावी लालच या बुज़दिली से दीनी अहकाम से मुँह मोड़ेंगे, उनका ठिकाना जहन्नम का दर्दनाक अज़ाब है।
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