Transliteration: (Muhammadur Rasoolul laah; wallazeena ma'ahooo ashiddaaa'u 'alal kuffaaari ruhamaaa'u bainahum taraahum rukka'an sujjadany yabtaghoona fadlam minal laahi wa ridwaana seemaahum fee wujoohihim min asaris sujood; zaalika masaluhum fit tawraah; wa masaluhum fil Injeeli kazar'in akhraja shat 'ahoo fa 'aazarahoo fastaghlaza fastawaa 'alaa sooqihee yu'jibuz zurraa'a liyagheeza bihimul kuffaar; wa'adal laahul lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati minhum maghfiratanw wa ajran 'azeemaa (section 4))
"मुहम्मद (ﷺ) अल्लाह के रसूल हैं [89]! और जो लोग उनके साथ हैं [90], वे काफ़िरों पर बहुत सख़्त हैं [91], आपस में निहायत मेहरबान हैं [92]। आप उन्हें रुकूअ और सजदा करते हुए देखेंगे [93], वे अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रज़ा तलाश करते हैं। उनके चेहरों पर सजदों का असर (नूरानी निशानी) है [94]। यह उनकी सिफ़त (वर्णन) तौरात में है, और इंजील में उनकी सिफ़त [95] उस खेती की तरह है [96] जिसने अपनी कोंपल निकाली, फिर उसे मज़बूत किया, फिर वह मोटी हुई, फिर अपने तने पर सीधी खड़ी हो गई, किसानों को ख़ुश करने लगी [97], ताकि उनके ज़रिए वह काफ़िरों के दिलों को जलाए [98]! अल्लाह ने उनमें से उन लोगों से जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, मग़फ़िरत और बहुत बड़े अज्र का वादा फ़रमाया है [99] [100]!"
कुरआन मजीद में सीधे तौर पर हुज़ूर ﷺ का नामे-नामी 'मुहम्मद' (जिसकी हर मख़लूक़ ने हद से ज़्यादा तारीफ़ की हो) बयान फ़रमाया गया और साथ ही 'रसूलुल्लाह' फ़रमाकर आपकी रिसालत का अटल एलान किया गया।
'जो उनके साथ हैं' से मुराद हुज़ूर ﷺ के तमाम अज़ीम सहाबा किराम हैं, जिनमें सबसे पहले और मुक़द्दम हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु हैं जो ग़ार-ए-सौर में भी हुज़ूर ﷺ के साथ थे और मदीना के रौज़ा-ए-अक़दस में भी साथ आराम फ़रमा रहे हैं।
वे अल्लाह के दीन की हिफ़ाज़त में बातिल के मुक़ाबले में पहाड़ की तरह सख़्त और अडिग हैं। यह सिफ़त ख़ास तौर पर हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु में झलकी जिनकी तलवार के ख़ौफ़ से कुफ़्र थर्राता था।
आपस में मोमिनों के साथ उनका सुलूक इंतहाई नरमी, हमदर्दी और रहमत का है। यह सिफ़त हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु में पूरी तरह ज़ाहिर हुई जो हया, सख़ावत और नरमी के पैकर थे।
सहाबा किराम रात-दिन नमाज़, रुकूअ और सजदों में डूबे रहते हैं। यह इबादत की शान हज़रत मौला अली मुर्तज़ा कर्रमल्लाहु वज्हहुल करीम और अहले-बैत में पूरी तरह नुमायां थी।
उनके चेहरों पर रात की इबादत और कसरत-ए-सजूद का एक ख़ास रूहानी नूर और पाकीज़गी चमकती है जो देखने वाले के दिल में इज़्ज़त पैदा कर देती है।
यह इस बात का सुबूत है कि सहाबा किराम की अज़्मत और शान पिछली आसमानी किताबों (तौरात व इंजील) में सदियों पहले से दर्ज थी।
सहाबा किराम की जमाअत को उस हरी-भरी खेती की मिसाल दी गई जो पहले एक नाज़ुक कोंपल के रूप में फूटी, फिर हुज़ूर ﷺ की तरबियत और सोहबत से ताक़तवर होकर एक मज़बूत दरख़्त बन गई जो किसान (हुज़ूर ﷺ) को ख़ुश कर रही है।
अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमाया कि सहाबा किराम की तरक़्क़ी और अज़्मत को देखकर काफ़िरों के दिल जलते हैं। इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह ने इसी आयत से इस्तिदलाल फ़रमाया कि जो शख़्स सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम से बुग़्ज़ रखता है या उन्हें बुरा कहता है, वह कुरआन की इस आयत के तहत काफ़िर है, क्योंकि सहाबा से सिर्फ़ वही जलता है जो काफ़िर हो।
अल्लाह तआला ने तमाम सहाबा किराम से, जिन्होंने ईमान लाया और नेक आमाल किए, मग़फ़िरत और जन्नत-उल-फ़िरदौस के सबसे अज़ीम दर्जात का वादा फ़रमा दिया है। सहाबा किराम की शान पर कोई उंगली नहीं उठा सकता!
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