Transliteration: (Laqad sadaqal laahu Rasoolahur ru'yaa bilhaqq, latadkhulunnal Masjidal-Haraama in shaaa'al laahu aamineena muhalliqeena ru'oosakum wa muqassireena laa takhaafoona fa'alima maa lam ta'lamoo faja'ala min dooni zaalika fathan qareebaa)
"बेशक अल्लाह ने अपने रसूल का सच्चा ख़्वाब सच कर दिखाया [81]! तुम ज़रूर मस्जिदे हराम में दाख़िल होगे, अगर अल्लाह ने चाहा तो पूरी सलामती के साथ [82], अपने सर मुंडाते हुए [83] या बाल कतरवाते हुए, बेख़ौफ़ होकर! तो उसने वह बात जान ली जो तुमने नहीं जानी थी [84], तो उसने इससे पहले एक नज़दीक की फ़तह (सुलह-ए-हुदैबिया व ख़ैबर) मुक़र्रर फ़रमा दी [85]!"
हुज़ूर अकरम ﷺ ने मदीना में ख़्वाब देखा था कि आप सहाबा के साथ अमन व अमान से हरम में दाख़िल हुए हैं और उमरा अदा करके सर मुंडवा रहे हैं। नबी का ख़्वाब हक़ होता है। जब हुदैबिया में उस साल दाख़िला न हुआ तो कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी हुई। इस आयत ने साफ़ फ़रमाया कि ख़्वाब में साल तय नहीं था; यह ख़्वाब अगले साल (उमरतुल क़ज़ा) और फ़तह-ए-मक्का के दिन पूरे जलाल के साथ सच होकर रहेगा।
अगले ही साल हुज़ूर ﷺ और दो हज़ार सहाबा ने पूरी शान व शौक़त और बेख़ौफ़ होकर हरम में दाख़िल होकर उमरा अदा फ़रमाया।
उमरे और हज के अरकान अदा करने के बाद सर के बाल मुंडवाना या छोटे करवाना सुन्नत है। हुज़ूर ﷺ ने सर मुंडवाने वालों के लिए तीन बार और बाल कतरवाने वालों के लिए एक बार रहमत व मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाई।
अल्लाह उन तमाम हिकमतों से वाक़िफ़ था जिन्हें इंसान उस वक़्त नहीं समझ सकते थे।
मक्का में दाख़िले से पहले ही अल्लाह ने हुदैबिया की सुलह और ख़ैबर की अज़ीम फ़तह अता फ़रमा दी।
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