Transliteration: (Iz ja'alal lazeena kafaroo fee quloobihimul hamiyyata hamiyyatal jaahiliyyati fa anzalal laahu sakeenatahoo 'alaa Rasoolihee wa 'alal mu mineena wa alzamahum kalimatat taqwaa wa kaanooo ahaqqa bihaa wa ahlahaa; wa kaanal laahu bikulli shai'in Aleema (section 3))
"जब काफ़िरों ने अपने दिलों में हठधर्मी बिठा ली—ज़माना-ए-जहालत की हठधर्मी [76]—तो अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपना दिली सुकून (सकीना) उतारा [77], और उन पर परहेज़गारी की बात (कलिमा-ए-तक़वा) लाज़िम फ़रमा दी [78], और वे इसके ज़्यादा हक़दार [79] और इसके अहल (योग्य) थे [80]। और अल्लाह हर चीज़ को ख़ूब जानने वाला है!"
मुशरिकीन-ए-मक्का के प्रतिनिधि सुहैल बिन अम्र ने हुदैबिया की सुलह के दस्तावेज़ में 'बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम' और 'मुहम्मदुर रसूलुल्लाह' लिखने पर झूठी ज़िद और अहंकार दिखाया।
सहाबा किराम को काफ़िरों की इस बदतमीज़ी पर सख़्त जलाल आ गया था, मगर अल्लाह ने रसूलुल्लाह ﷺ और सहाबा के दिलों पर सकीना नाज़िल फ़रमाया जिससे उन्होंने ग़ुस्से को पी लिया और सुलह के आला मक़सद के लिए सब्र इख़्तियार किया।
अल्लाह ने उन पर कलिमा-ए-तौहीद, अदब और तक़वे को लाज़िम फ़रमा दिया।
अल्लाह ने गवाही दी कि हुज़ूर ﷺ के सहाबा ही इस रूहानी पाकीज़गी, तक़वे और रज़ा के सबसे सच्चे हक़दार और अहल थे।
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