Transliteration: (Laqad radiyal laahu 'anil mu'mineena iz yubaayi 'oonaka tahtash shajarati fa'alima maa fee quloobihim fa anzalas sakeenata 'alaihim wa asaa bahum fat han qareebaa)
"बेशक अल्लाह मोमिनों से राज़ी हो गया [51] [52] जब वे उस दरख़्त के नीचे आपकी बयअ़त कर रहे थे [53]! तो जो कुछ उनके दिलों में था, अल्लाह ने उसे जान लिया, तो उसने उन पर दिली सुकून (सकीना) उतारा [54] और उन्हें एक नज़दीक की फ़तह (ख़ैबर) से नवाज़ा [55]!"
यह कुरआन मजीद की उन अज़ीम तरीन आयतों में से है जो सहाबा किराम की पाकीज़गी और मग़फ़िरत पर अटल मोहर लगाती हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि वह उन तमाम मोमिनों से हमेशा के लिए राज़ी हो गया। जब अल्लाह किसी से राज़ी हो जाए, तो उसके बाद कभी उस पर नाराज़ नहीं होता।
कुरआन ने उन्हें साफ़ तौर पर 'मोमिनीन' (सच्चे ईमान वाले) फ़रमाया। यह उन तमाम गुमराह फ़िरक़ों (जैसे राफ़िज़ियों) का खुला रद्द है जो सहाबा किराम पर निफ़ाक़ या कुफ़्र का झूठा इल्ज़ाम लगाते हैं। अगर उनमें कोई निफ़ाक़ होता तो सर्वज्ञानी अल्लाह उन्हें मोमिन न कहता और अपनी रज़ा का एलान न फ़रमाता।
हुदैबिया में बबूल के दरख़्त के नीचे चौदह सौ (1400) सहाबा ने हुज़ूर अकरम ﷺ के दस्त-ए-मुबारक पर अपनी जानों की क़ुरबानी की बयअ़त की थी। हुज़ूर ﷺ ने अपने एक हाथ को हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु का हाथ क़रार देकर उनकी तरफ़ से भी बयअ़त ली। इस मुबारक बयअ़त को 'बयअ़ते रिज़वान' कहा जाता है।
अल्लाह तआला ने उनके दिलों की सच्चाई, इख़्लास और नबी ﷺ से बेपनाह मोहब्बत को देख लिया, और उन पर ऐसा रूहानी इत्मीनान और सुकून नाज़िल फ़रमाया जिसने उनके हर ख़ौफ़ को दूर कर दिया।
हुदैबिया से वापसी के फ़ौरन बाद अल्लाह तआला ने ख़ैबर के मज़बूत क़िलों पर मुसलमानों को ऐतिहासिक फ़तह अता फ़रमाई।
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