कुरान - 48:16 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
قُل لِّلۡمُخَلَّفِينَ مِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ سَتُدۡعَوۡنَ إِلَىٰ قَوۡمٍ أُوْلِي بَأۡسٖ شَدِيدٖ تُقَٰتِلُونَهُمۡ أَوۡ يُسۡلِمُونَۖ فَإِن تُطِيعُواْ يُؤۡتِكُمُ ٱللَّهُ أَجۡرًا حَسَنٗاۖ وَإِن تَتَوَلَّوۡاْ كَمَا تَوَلَّيۡتُم مِّن قَبۡلُ يُعَذِّبۡكُمۡ عَذَابًا أَلِيمٗا

Transliteration: (Qul lilmukhallafeena minal A'raabi satud'awna ilaa qawmin ulee baasin shadeedin tuqaati loonahum aw yuslimoona fa in tutee'oo yu'tikumul laahu ajran hasananw wa in tatawallaw kamaa tawallaitum min qablu yu'azzibkum 'azaaban aleemaa)

पीछे रह जाने वाले देहाती बद्दूओं से फ़रमा दीजिए [42]: "जल्द ही तुम्हें एक सख़्त जंगजू क़ौम के ख़िलाफ़ बुलाया जाएगा [43], तुम उनसे लड़ोगे या वे मुसलमान हो जाएँगे [44]। फिर अगर तुम हुक्म मानोगे, तो अल्लाह तुम्हें अच्छा सवाब अता फ़रमाएगा [45], और अगर तुम मुँह मोड़ोगे जैसा कि तुमने पहले मुँह मोड़ा था, तो वह तुम्हें दर्दनाक अज़ाब देगा [46]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 16

"पीछे रह जाने वाले देहाती बद्दूओं से फ़रमा दीजिए [42]: 'जल्द ही तुम्हें एक सख़्त जंगजू क़ौम के ख़िलाफ़ बुलाया जाएगा [43], तुम उनसे लड़ोगे या वे मुसलमान हो जाएँगे [44]। फिर अगर तुम हुक्म मानोगे, तो अल्लाह तुम्हें अच्छा सवाब अता फ़रमाएगा [45], और अगर तुम मुँह मोड़ोगे जैसा कि तुमने पहले मुँह मोड़ा था, तो वह तुम्हें दर्दनाक अज़ाब देगा [46]!'"


[42] पीछे रह जाने वाले बद्दूओं की आज़माइश

जो बद्दू हुदैबिया के सफ़र में बुज़दिली दिखाकर पीछे रह गए थे, उन्हें अब अपनी वफ़ादारी साबित करने का एक और मौक़ा दिया जा रहा है।


[43] सख़्त जंगजू क़ौम और खुलफ़ा-ए-राशीदीन की ख़िलाफ़त का सुबूत

यहाँ 'सख़्त जंगजू क़ौम' से मुराद अहले-फ़ार्स (ईरान), अहले-रूम (रोमन साम्राज्य) और बनू हनीफ़ा (मुसैलमा कज़्ज़ाब के पैरोकार) हैं।

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि यह आयत हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हुमा की बरहक़ ख़िलाफ़त का खुला कुरआनी सुबूत है। क्योंकि हुज़ूर ﷺ के विसाल के बाद इन बद्दूओं को इन ताक़तवर क़ौमों के ख़िलाफ़ जिहाद के लिए बुलाने वाले हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर और हज़रत फ़ारूक़-ए-आज़म ही थे। कुरआन ने उनके हुक्म मानने को 'अल्लाह का हुक्म मानना' और उससे मुँह मोड़ने को 'दर्दनाक अज़ाब' का कारण ठहराया।


[44] इस्लाम क़बूल करना या जंग

यह जिहाद ज़मीन या दौलत के लिए नहीं, बल्कि फ़ितना ख़त्म करने के लिए था; दुश्मन या तो अपनी सरकशी छोड़कर इस्लाम क़बूल कर ले या मैदाने-जंग में हथियार डाल दे।


[45] इताअत पर अज़ीम अज्र

अगर वे सच्चे दिल से इस्लामी ख़िलाफ़त और अमीर के हुक्म पर जिहाद में शामिल होंगे, तो अल्लाह उनके पिछले गुनाहों को माफ़ फ़रमाकर अज़ीम अज्र अता फ़रमाएगा।


[46] मुँह मोड़ने पर दर्दनाक अज़ाब

अगर उन्होंने दोबारा बुज़दिली और गद्दारी दिखाई, तो दुनिया में भी ज़िल्लत होगी और आख़िरत में जहन्नम की आग का दर्दनाक अज़ाब भुगतना पड़ेगा।

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