Transliteration: (Sa yaqoolul mukhalla foona izan talaqtum ilaa maghaanima litaakhuzoohaa zaroonaa nattabi'kum yureedoona any yubaddiloo Kalaamallaah; qul lan tattabi'oonaa kazaalikum qaalal laahu min qablu fasa yaqooloona bal tahsudoonanna; bal kaanoo laa yafqahoona illaa qaleela)
"जब तुम माले-ग़नीमत लेने चलोगे [37], तो पीछे रह जाने वाले कहेंगे: 'हमें भी अपने साथ चलने दो!' वे चाहते हैं कि अल्लाह के फ़रमान को बदल दें [38]। आप फ़रमा दीजिए: 'तुम हमारे साथ हरगिज़ नहीं चल सकते [39]! अल्लाह ने पहले ही ऐसा फ़रमा दिया है।' तब वे कहेंगे: 'नहीं! बल्कि तुम हमसे हसद (जलन) करते हो [40]।' नहीं, बल्कि वे बहुत ही कम समझते हैं [41]!"
हुदैबिया की वापसी के बाद जब हुज़ूर ﷺ ने यहूदियों के मज़बूत गढ़ ख़ैबर पर चढ़ाई का इरादा फ़रमाया, तो अल्लाह तआला ने हुक्म दिया कि ख़ैबर के माले-ग़नीमत में सिर्फ़ वही लोग शरीक होंगे जो हुदैबिया के कठिन इम्तिहान और बयअ़ते रिज़वान में शामिल थे।
जब मुनाफ़िक़ों ने देखा कि ख़ैबर में बहुत सा माले-ग़नीमत मिलने वाला है और ख़तरा कम है, तो वे लालच में आकर साथ चलने की ज़िद करने लगे। वे चाहते थे कि अल्लाह के उस फ़ैसले को बदलवा लें जिसने ख़ैबर को ख़ास अहले-हुदैबिया के लिए मख़्सूस किया था।
हुज़ूर ﷺ ने साफ़ फ़रमा दिया कि तुम हमारे साथ नहीं चल सकते, क्योंकि यह मेरा ज़ाती फ़ैसला नहीं बल्कि अल्लाह तआला का हुक्म है। इस्लाम में सवाब और माले-ग़नीमत सिर्फ़ उन्हीं को मिलता है जो इख़्लास के साथ अल्लाह की राह में मुशक़्क़त उठाते हैं।
अपनी लालच और नाकामी पर पर्दा डालने के लिए मुनाफ़िक़ों ने सहाबा किराम पर इल्ज़ाम लगाया कि तुम हमसे हसद करते हो ताकि हमें माल न मिले। यह उनकी बदबातिनी का सुबूत था।
अल्लाह ने फ़रमाया कि वे दीनी अहकाम, इख़्लास और इलाही तक़सीम की हिकमत को नहीं समझते; उनकी सारी सोच सिर्फ़ दुनियावी दौलत और लालच तक सीमित है।
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