कुरान - 48:15 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
سَيَقُولُ ٱلۡمُخَلَّفُونَ إِذَا ٱنطَلَقۡتُمۡ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأۡخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعۡكُمۡۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُواْ كَلَٰمَ ٱللَّهِۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمۡ قَالَ ٱللَّهُ مِن قَبۡلُۖ فَسَيَقُولُونَ بَلۡ تَحۡسُدُونَنَاۚ بَلۡ كَانُواْ لَا يَفۡقَهُونَ إِلَّا قَلِيلٗا

Transliteration: (Sa yaqoolul mukhalla foona izan talaqtum ilaa maghaanima litaakhuzoohaa zaroonaa nattabi'kum yureedoona any yubaddiloo Kalaamallaah; qul lan tattabi'oonaa kazaalikum qaalal laahu min qablu fasa yaqooloona bal tahsudoonanna; bal kaanoo laa yafqahoona illaa qaleela)

जब तुम माले-ग़नीमत लेने चलोगे [37], तो पीछे रह जाने वाले कहेंगे: "हमें भी अपने साथ चलने दो!" वे चाहते हैं कि अल्लाह के फ़रमान को बदल दें [38]। आप फ़रमा दीजिए: "तुम हमारे साथ हरगिज़ नहीं चल सकते [39]! अल्लाह ने पहले ही ऐसा फ़रमा दिया है।" तब वे कहेंगे: "नहीं! बल्कि तुम हमसे हसद (जलन) करते हो [40]।" नहीं, बल्कि वे बहुत ही कम समझते हैं [41]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 15

"जब तुम माले-ग़नीमत लेने चलोगे [37], तो पीछे रह जाने वाले कहेंगे: 'हमें भी अपने साथ चलने दो!' वे चाहते हैं कि अल्लाह के फ़रमान को बदल दें [38]। आप फ़रमा दीजिए: 'तुम हमारे साथ हरगिज़ नहीं चल सकते [39]! अल्लाह ने पहले ही ऐसा फ़रमा दिया है।' तब वे कहेंगे: 'नहीं! बल्कि तुम हमसे हसद (जलन) करते हो [40]।' नहीं, बल्कि वे बहुत ही कम समझते हैं [41]!"


[37] ख़ैबर का माले-ग़नीमत और हुदैबिया वालों का ख़ास हक़

हुदैबिया की वापसी के बाद जब हुज़ूर ﷺ ने यहूदियों के मज़बूत गढ़ ख़ैबर पर चढ़ाई का इरादा फ़रमाया, तो अल्लाह तआला ने हुक्म दिया कि ख़ैबर के माले-ग़नीमत में सिर्फ़ वही लोग शरीक होंगे जो हुदैबिया के कठिन इम्तिहान और बयअ़ते रिज़वान में शामिल थे।


[38] अल्लाह के हुक्म को बदलने की कोशिश

जब मुनाफ़िक़ों ने देखा कि ख़ैबर में बहुत सा माले-ग़नीमत मिलने वाला है और ख़तरा कम है, तो वे लालच में आकर साथ चलने की ज़िद करने लगे। वे चाहते थे कि अल्लाह के उस फ़ैसले को बदलवा लें जिसने ख़ैबर को ख़ास अहले-हुदैबिया के लिए मख़्सूस किया था।


[39] हुज़ूर ﷺ का साफ़ और दो-टूक इनकार

हुज़ूर ﷺ ने साफ़ फ़रमा दिया कि तुम हमारे साथ नहीं चल सकते, क्योंकि यह मेरा ज़ाती फ़ैसला नहीं बल्कि अल्लाह तआला का हुक्म है। इस्लाम में सवाब और माले-ग़नीमत सिर्फ़ उन्हीं को मिलता है जो इख़्लास के साथ अल्लाह की राह में मुशक़्क़त उठाते हैं।


[40] सहाबा पर हसद का झूठा इल्ज़ाम

अपनी लालच और नाकामी पर पर्दा डालने के लिए मुनाफ़िक़ों ने सहाबा किराम पर इल्ज़ाम लगाया कि तुम हमसे हसद करते हो ताकि हमें माल न मिले। यह उनकी बदबातिनी का सुबूत था।


[41] दीनी हक़ीक़त से बेख़बरी

अल्लाह ने फ़रमाया कि वे दीनी अहकाम, इख़्लास और इलाही तक़सीम की हिकमत को नहीं समझते; उनकी सारी सोच सिर्फ़ दुनियावी दौलत और लालच तक सीमित है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now