कुरान - 48:13 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

13
وَمَن لَّمۡ يُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ فَإِنَّآ أَعۡتَدۡنَا لِلۡكَٰفِرِينَ سَعِيرٗا

Transliteration: (Wa mal lam yu'mim billaahi wa Rasoolihee fainnaaa a'tadnaa lilkaafireena sa'eeraa)

और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाए [34], तो बेशक हमने काफ़िरों के लिए दहकती हुई आग तैयार कर रखी है! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 13 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 13

"और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाए [34], तो बेशक हमने काफ़िरों के लिए दहकती हुई आग तैयार कर रखी है!"


[34] रसूल पर ईमान न लाना अल्लाह के इनकार के बराबर है

इस आयत से दो अज़ीम इस्लामी अक़ीदे स्पष्ट होते हैं:

  1. रसूल का इनकार अल्लाह का इनकार है: जो शख़्स नबी-ए-पाक मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की रिसालत का इनकार करता है, वह चाहे ज़बान से अल्लाह को मानने का कितना ही दावा करे, अल्लाह की बारगाह में वह काफ़िर है और उसके लिए जहन्नम की दहकती आग तैयार है।
  2. हुज़ूर ﷺ के ग़ैबी इल्म और ख़्वाब पर यक़ीन: जिन लोगों ने हुज़ूर ﷺ के मुबारक ख़्वाब (उमरे के दाख़िले) पर शक किया था, उन्हें आगाह किया गया कि नबी की बात पर शक करना कुफ़्र के रास्ते पर ले जाता है। नबी का ख़्वाब भी वही-ए-इलाही होता है और नबी को अल्लाह की अता से ग़ैब का इल्म हासिल होता है।

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