Transliteration: (Sa yaqoolu lakal mukhal lafoona minal-A'raabi shaighalatnaaa amwaalunaa wa ahloonaa fastaghfir lanaa; yaqooloona bi alsinatihim maa laisa fee quloobihim; qul famany yamliku lakum minal laahi shai'an in araada bikum darran aw araada bikum naf'aa; bal kaanal laahu bimaa ta'maloona Khabeeraa)
"पीछे रह जाने वाले देहाती (बद्दू) अब आपसे कहेंगे [26]: 'हमारे मालों और हमारे अहलो-अयाल ने हमें मसरूफ़ रखा [27], इसलिए आप हमारे लिए मग़फ़िरत की दुआ फ़रमा दीजिए [28]।' वे अपनी ज़बानों से वह कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं है [29]। आप फ़रमा दीजिए: 'फिर कौन है जो अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे किसी नफ़ा या नुक़सान का इख़्तियार रखता है, अगर वह तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहे [30] या तुम्हें फ़ायदा देना चाहे?' बल्कि जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे पूरी तरह बाख़बर है!"
जब हुज़ूर ﷺ ने मदीना के आसपास के देहाती क़बीलों (जैसे जुहैना, मुज़ैना, ग़फ़ार) को उमरे के सफ़र में साथ चलने की दावत दी, तो मुनाफ़िक़ क़िस्म के लोग डर के मारे पीछे रह गए। उन्होंने सोचा कि निहत्थे मुसलमान मक्का वालों से कभी बचकर नहीं आ सकेंगे।
जब हुज़ूर ﷺ सही-सलामत और कामयाब होकर मदीना वापस आए, तो वे शर्मिंदा होकर झूठे बहाने बनाने लगे कि हम मवेशियों और बच्चों की देखरेख में फँस गए थे।
वे ज़ाहिरी तौर पर अपनी साख बचाने के लिए हुज़ूर ﷺ से अर्ज़ करते थे कि आप हमारे लिए अल्लाह से मग़फ़िरत माँग लें।
अल्लाह ने उनके निफ़ाक़ को बेनक़ाब फ़रमाया कि वे ज़बान से तो दुआ माँगने की बात करते हैं, मगर उनके दिलों में न तो तौबा का सच्चा इरादा है और न ही नबी ﷺ की सच्ची अज़मत।
उन्हें बता दिया गया कि मौत और नुक़सान से घर बैठकर नहीं बचा जा सकता। अगर अल्लाह किसी को नुक़सान पहुँचाना चाहे तो कोई ताक़त नहीं बचा सकती, और अगर फ़ायदा देना चाहे तो कोई रोक नहीं सकता।
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