कुरान - 48:10 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

10
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ ٱللَّهَ يَدُ ٱللَّهِ فَوۡقَ أَيۡدِيهِمۡۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَىٰ نَفۡسِهِۦۖ وَمَنۡ أَوۡفَىٰ بِمَا عَٰهَدَ عَلَيۡهُ ٱللَّهَ فَسَيُؤۡتِيهِ أَجۡرًا عَظِيمٗا

Transliteration: (Innal lazeena yubaayi'oonaka innamaa yubaayi'oonal laaha yadul laahi fawqa aydeehim; faman nakasa fainnamaa yankusu 'alaa nafsihee wa man awfaa bimaa 'aahada 'alaihullaaha fasa yu'teehi ajran 'azeemaa (section 1))

बेशक जो लोग आपकी बयअ़त करते हैं, वे हक़ीक़त में अल्लाह ही की बयअ़त करते हैं! अल्लाह का हाथ उनके हाथों के ऊपर है [23]! फिर जो कोई अहद तोड़ेगा, तो वह अपने ही नुक़सान के लिए अहद तोड़ेगा [24], और जो उस अहद को पूरा करेगा जो उसने अल्लाह से किया है, तो अल्लाह जल्द ही उसे बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएगा [25]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 10 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 10

"बेशक जो लोग आपकी बयअ़त करते हैं, वे हक़ीक़त में अल्लाह ही की बयअ़त करते हैं! अल्लाह का हाथ उनके हाथों के ऊपर है [23]! फिर जो कोई अहद तोड़ेगा, तो वह अपने ही नुक़सान के लिए अहद तोड़ेगा [24], और जो उस अहद को पूरा करेगा जो उसने अल्लाह से किया है, तो अल्लाह जल्द ही उसे बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएगा [25]!"


[23] बयअ़ते रिज़वान और 'यददुल्लाहि फ़ौक़ा ऐदीहिम' (अल्लाह का हाथ)

यह आयत हुदैबिया में बबूल के दरख़्त के नीचे होने वाली बयअ़ते रिज़वान के बारे में नाज़िल हुई, जब हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत की अफ़वाह फैली तो चौदह सौ सहाबा ने हुज़ूर ﷺ के मुबारक हाथ पर जान देने की बयअ़त की।

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ऐ महबूब! आपके हाथ पर बयअ़त करना हक़ीक़त में अल्लाह ही के हाथ पर बयअ़त करना है, और आपका हाथ मख़लूक़ के हाथों के ऊपर अल्लाह के दस्त-ए-कुदरत का मज़हर है। इससे साबित हुआ कि हुज़ूर ﷺ का दस्त-ए-मुबारक अल्लाह का दस्त-ए-कुदरत है; जो रसूल से जुड़ा वह अल्लाह से जुड़ गया।


[24] अहद तोड़ने का अज़ाब

जो शख़्स इस मुक़द्दस बयअ़त और वफ़ादारी के अहद को तोड़ेगा, वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ सकता बल्कि ख़ुद अपनी ही दुनिया और आख़िरत को बर्बाद करेगा।


[25] वफ़ादारी का अज़ीम अज्र

जिन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ से किए गए अहद को वफ़ादारी और जान की क़ुरबानी के साथ निभाया, अल्लाह ने उनसे रज़ा का वादा फ़रमाया और आख़िरत में उनके लिए अज़ीम अज्र व जन्नत तय फ़रमा दी।

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