Transliteration: (Litu minoo billaahi wa Rasoolihee wa tu'azziroohu watuwaqqiroohu watusabbi hoohu bukratanw wa aseelaa)
"ताकि (ऐ लोगो!) तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ [20], और रसूल की ताज़ीम व इज़्ज़त करो [21], और सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करो [22]!"
सच्चा ईमान वही है जो अल्लाह और उसके महबूब रसूल ﷺ दोनों पर एक साथ हो। नबी का इनकार सीधे अल्लाह का इनकार है।
यहाँ दो अज़ीम लफ़्ज़ आए हैं: 'तुअ़ज़्ज़िरूहु' (यानी रसूल की मदद व हिमायत करो) और 'तुवक़्क़िरूहु' (यानी रसूल की दिली ताज़ीम, अदब और इज़्ज़त करो)।
इससे यह बुनियादी इस्लामी अक़ीदा साबित हुआ कि हुज़ूर अकरम ﷺ की ताज़ीम और अदब ईमान की जान है। जिस दिल में नबी-ए-करीम ﷺ का अदब व ताज़ीम नहीं, उसका कोई अमल, नमाज़ या रोज़ा अल्लाह की बारगाह में क़बूल नहीं होता।
सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करने और उसकी नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया गया। इस आयत में आदाब-ए-दीन का कामिल निज़ाम है: रसूल के लिए ताज़ीम व मोहब्बत, और अल्लाह के लिए इबादत व तस्बीह।
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