कुरान - 48:9 सूरह अल-फत्ह अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

9
لِّتُؤۡمِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُۚ وَتُسَبِّحُوهُ بُكۡرَةٗ وَأَصِيلًا

Transliteration: (Litu minoo billaahi wa Rasoolihee wa tu'azziroohu watuwaqqiroohu watusabbi hoohu bukratanw wa aseelaa)

ताकि (ऐ लोगो!) तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ [20], और रसूल की ताज़ीम व इज़्ज़त करो [21], और सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करो [22]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फत्ह आयत 9 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-फ़तह तफ़सीर - आयत 9

"ताकि (ऐ लोगो!) तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ [20], और रसूल की ताज़ीम व इज़्ज़त करो [21], और सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करो [22]!"


[20] ईमान-ए-मुकम्मल की बुनियाद

सच्चा ईमान वही है जो अल्लाह और उसके महबूब रसूल ﷺ दोनों पर एक साथ हो। नबी का इनकार सीधे अल्लाह का इनकार है।


[21] ताज़ीमे रसूल ﷺ (तुअ़ज़्ज़िरूहु व तुवक़्क़िरूहु)

यहाँ दो अज़ीम लफ़्ज़ आए हैं: 'तुअ़ज़्ज़िरूहु' (यानी रसूल की मदद व हिमायत करो) और 'तुवक़्क़िरूहु' (यानी रसूल की दिली ताज़ीम, अदब और इज़्ज़त करो)।

इससे यह बुनियादी इस्लामी अक़ीदा साबित हुआ कि हुज़ूर अकरम ﷺ की ताज़ीम और अदब ईमान की जान है। जिस दिल में नबी-ए-करीम ﷺ का अदब व ताज़ीम नहीं, उसका कोई अमल, नमाज़ या रोज़ा अल्लाह की बारगाह में क़बूल नहीं होता।


[22] अल्लाह की तस्बीह व इबादत

सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करने और उसकी नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया गया। इस आयत में आदाब-ए-दीन का कामिल निज़ाम है: रसूल के लिए ताज़ीम व मोहब्बत, और अल्लाह के लिए इबादत व तस्बीह।

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