Transliteration: (Bal zanantum al lany yanqalibar Rasoolu walmu'minoona ilaaa ahleehim abadanw wa zuyyina zaalika fee quloobikum wa zanantum zannnas saw'i wa kuntum qawmam booraa)
"बल्कि तुमने तो यह गुमान कर लिया था कि रसूल और मोमिन अपने घरों की तरफ़ कभी लौटकर नहीं आ सकेंगे [31], और यह बात तुम्हारे दिलों को बहुत अच्छी लगी थी, और तुमने बहुत बुरा गुमान किया था [32], और तुम हलाक होने वाले लोग थे [33]!"
मुनाफ़िक़ों का असली छुपा हुआ विचार यह था कि कुरैश-ए-मक्का मुसलमानों को घेरकर क़त्ल कर देंगे और कोई एक भी ज़िंदा वापस मदीना नहीं लौट सकेगा।
उनके दिलों में इस्लाम और नबी ﷺ की मुख़ालिफ़त ऐसी रची-बसी थी कि मुसलमानों की हलाकत की झूठी उम्मीद उन्हें बहुत भली और दिलकश लगती थी। उन्होंने समझा कि बातिल हक़ को मिटा देगा।
अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐसी गंदी सोच रखने वाले लोग रूहानी और अख़लाक़ी तौर पर तबाह हो चुके हैं। उनका अंजाम दुनिया में रुसवाई और आख़िरत में जहन्नम की आग है।
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