Transliteration: (Liyudkhilal mu'mineena walmu'minaati jannaatin tajree min tahtihal anhaaru khaalideena feehaa wa yukaffira 'anhum saiyi aatihim; wa kaana zaalika 'indal laahi fawzan 'azeemaa)
"ताकि वह मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को उन बाग़ों में दाख़िल फ़रमाए [11] जिनके नीचे नहरें बहती हैं, वे उनमें हमेशा रहेंगे [12], और उनकी बुराइयों को उनसे मिटा दे। और यह अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ी कामयाबी है [13]!"
जब हुज़ूर ﷺ को फ़तह और मग़फ़िरत की खुशख़बरी मिली, तो सहाबा किराम ने अर्ज़ किया: "या रसूलुल्लाह! यह मुबारक मुबारक हो, लेकिन हमारे लिए क्या है?" इस पर अल्लाह ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई कि ईमान वाले मर्द और औरतें इस फ़तह पर अल्लाह का शुक्र अदा करें, और इस शुक्र की बरकत से वे हमेशा की जन्नत के हक़दार बन जाएँगे।
सुलह-ए-हुदैबिया में सब्र करना, दरख़्त के नीचे हुज़ूर ﷺ के हाथ पर बयअ़ते रिज़वान करना और फ़तह-ए-मक्का में शामिल होना—ये तमाम अज़ीम आमाल मोमिनों की मग़फ़िरत और उनके गुनाहों के मिटने का ज़रिया बन गए।
सहाबा किराम को दोनों जहानों की सरबुलंदी हासिल हुई: दुनिया में उनका नाम इज़्ज़त और मोहब्बत से लिया जाता है, और आख़िरत में उन्हें जन्नत के सबसे आला दरजात और दीदार-ए-इलाही की नेमत नसीब होगी।
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